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Tuesday, November 17, 2015

व्यापार की उन्नति और सफलता के लिए - Business growth and success

जीवन में प्रत्येक व्यक्ति अपनी उन्नति के लिए व्यवसाय शुरू करता है परन्तु कई बार यह देखने में आता है कि व्यक्ति मेहनत तो बहुत करता है-परंतु उतना लाभ उसको नहीं मिलता- जिससे वह हमेशा दुखी रहता है-आज हम आपको इस लेख में बताने का प्रयास कर रहे है कि किस -किस राशि के लोग व्यापार कर रहे है उनको क्या सावधानियां करनी चाहिए तथा क्या उपाय और मन्त्र तथा क्या टोटके भी है थोडा सा प्रयास से आपका व्यापार उन्नति की तरफ बढे तो आपका पारिवारिक जीवन सुखी होता है और मानसिक शांति आती है-




लगन और विश्वाश के साथ कुछ मन्त्र और प्रयोग जो आपको करने में आसान लगे अपनाए यहाँ ये पूर्ण प्रभावी मन्त्र उन सभी के लिए दिया जा रहा है जो व्यापार में घोर निराशा में डूबे है करे और ईश्वर के आशीर्वाद से व्यापार में अत्यंत लाभ मिलेगा।लेकिन पहले हम जानते है राशियों के अनुसार आप क्या करे क्युकि अक्सर देखा गया है कि कई लोगों के मन में अपना खुद का बिजनेस करने और सफल उद्यमी बनने की तमन्ना होती है। लेकिन कई बार बेहतर रिसर्च और जमीनी स्तर पर सारी तैयारियां करने के बाद भी व्यक्ति को सफलता नहीं मिलती-


इसके पीछे ज्योतिषीय कारण भी हो सकते हैं। क्योंकि हर राशि की अपनी एक अलग खासियत होती है जो व्यक्ति को बिजनेस की दुनिया में सफल बना सकती है। आप भी जाने -


मेष (Aries)- 

मेष राशि के जातकों में जन्म से लीडरशिप क्वॉलिटी होती है और उन्हें किसी चीज का प्रभारी बनना अच्छा लगता है। हालांकि इनमें कूटनीतिक आचरण की कमी होती है। सफल व्यवसाय करने के लिए जरुरी है कि मेष राशिवाले लोगों और परिस्थितियों को चतुराई से हैंडल करना सीखें-

वृष (Tauras)- 
मिथुन (Gemini)- 
कर्क (Cancer)- 
सिंह (Leo)- 
कन्या (Virgo)- 
तुला (Libra)- 
वृश्चिक (Scorpio)- 
धनु (Sagittarius)- 
मकर (Capricorn)- 
कुंभ (Aquarius)- 
मीन (Pisces)- 

वृष राशि वाले अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। लेकिन अधिकतर समय यह लोग पुराने और रुढ़िवादी तरीकों पर ही ज्यादा भरोसा करते हैं। अपने व्यापार को नई ऊंचाईयों तक ले जाने के लिए जरुरी है कि वृष राशि के लोग नई तकनीक और नए दृष्टिकोण का इस्तेमाल करें-



इस राशिवालों की खासियत यह है कि यह लोग किसी को भी कोई भी काम करने के लिए आसानी से राजी कर सकते हैं। लेकिन कई बार जरुरत से ज्यादा बोलने की वजह से किसी रहस्य की बात को छिपाकर नहीं रख पाते। बिजनेस में सफल होने के लिए जरुरी है कि मिथुन राशिवाले सहनशील बनें और स्थिर रहना सीखें-


व्यापार-व्यवसाय के प्रति गहरी रुचि की वजह से कर्क राशिवाले अपने क्लायंट को खुश रखने जानते हैं। लेकिन कई बार गुजरते समय के साथ ये लापरवाह हो जाते हैं और बिजनेस में दिलचस्पी खो देते हैं। अपने व्यवसाय को ऊंचाईयों पर बनाए रखने के लिए जरुरी है कि कर्क राशिवाले व्यवसाय में अपनी लय और दिलचस्पी बरकरार रखें-


सिंह राशिवाले बेहतर नेता, संयोजक और प्रबंधक होते हैं। लेकिन कई बार अनिश्चितता या नुकसान होने पर यह जल्दी घबरा जाते हैं और खुद को परेशानी में डाल लेते हैं। व्यापार में सफल होने के लिए जरुरी है कि ये समय के साथ चलना सीखें। साथ ही दूसरों पर अपनी बात थोपने की बजाए उनके विचार और सुझावों को भी सुनना चाहिए-


कन्या राशिवाले पर्फेक्शनिस्ट होते हैं और घटिया काम उनसे बर्दाश्त नहीं होता। ये चाहते हैं कि लोग इनकी निपुणता और उत्कृष्टता की बराबरी करें। रुकावटें आने पर ये बड़ी जल्दी उदास हो जाते हैं। व्यवसाय में सफल होने के लिए जरुरी है कि कन्या राशिवाले अपनी भावनाओं और स्वभाव पर काबू रखें-


अपने कूटनीतिक आचरण और बेहतर संपर्कों की वजह से तुला राशिवाले बिना समय गंवाए अपने व्यवसाय के लिए क्लायंट और निवेशकों को तैयार कर लेते हैं। लेकिन उनकी हिचकिचाहट और उतावलापन कई बार दूसरों को हैरान कर देती है। सकारात्मक नजरिया और दृढ़ दृष्टिकोण के साथ तुला राशिवाले अपने व्यापार को ऊंचाईयों तक ले जा सकते हैं-


बिजनेस में सफल होने के लिए वृश्चिक राशिवाले कई बार लंबे समय तक बिना रुके प्रेशर में काम कर लेते हैं। वे अपने जुनून का कुछ इस तरह अनुसरण करते हैं कि दूसरे लोग कई बार उन्हें गलत समझ लेते हैं। व्यापार में सफल होने के लिए जरुरी है कि वृश्चिक राशि वाले लोगों और परिस्थितियों को चतुराई से हैंडल करना सीखें-


धनु राशिवाले किसी प्रोजेक्ट को शुरू तो पूरे उत्साह के साथ करते हैं लेकिन यदि उसका परिणाम आने में थोड़ा वक्त लगता है तो वो तुरंत ही पहले वाले को छोड़कर दूसरे प्रोजेक्ट में लग जाते हैं। कई बार इनका व्यवहार अविवेकी हो जाता है। यदि धनु राशिवाले व्यापार में सफल होना चाहते हैं तो उन्हें सीखना होगा कि किस तरह एक काम को खत्म करने के बाद ही दूसरे काम की ओर बढ़ें-


मकर राशिवाले व्यवसाय में चुपचाप, विचार और विमर्श और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ते हैं। वो ऐसा पद या दर्जा हासिल करना पसंद करते हैं जहां उन्हें संचालन का ज्यादा से ज्यादा अधिकार मिल सके। उनके इस व्यवहार को कई बार उनके साथी ही गलत समझ लेते हैं। अपनी भावनाओं पर पूरा नियंत्रण ही मकर राशिवालों के लिए बिजनेस में सफल होने का मूल मंत्र है-


इस राशि के लोग कड़ी मेहनत करने वाले और बेहद उत्साही होते हैं जो अपने व्यवसाय को सफल बनाने के लिए पूरा जोर लगा देते हैं। कई बार दबाव और चिंता में ये लोग बेहद आक्रामक और असभ्य व्यवहार कर देते हैं। कुंभ राशिवालों के लिए बिजनेस में सफल होने के दो मूल मंत्र हैं। अपने गुस्से पर काबू पाना और तनाव से कैसें निपटें ये सीखना-


मीन राशि के जातक अक्सर जोश और मोह-माया से प्रभावित होते हैं। और अक्सर इनका व्यापार कल्पनाशक्ति, रचनात्मकता और मुनाफे से भरा होता है। लेकिन इस प्रक्रिया में ये लोग कई बार हकीकत से दूर हो जाते हैं। सफल बिजनेस के लिए जरुरी है कि मीन राशि वाले बेहतर प्लानिंग करें और हकीकत के धरातल पर रहें-

अब आप जाने कि व्यापार में मंदी है या उन्नति नहीं हो रही है या घाटा हो रहा है तो क्या करे इनको आप खुद कर सकते है-नीचे के लिंक पे क्लिक करे और पढ़े -

धूर्त-पाखंडी लोगो के चक्कर में पड़ कर और नुकसान न करे-

धूर्त-पाखंडी लोगो के चक्कर में पड़ कर और नुकसान न करे - Does not harm Sly-goody people falling in and around

अब आप जाने कि व्यापार में मंदी है या उन्नति नहीं हो रही है या घाटा हो रहा है तो क्या करे इनको आप खुद कर सकते है - अगर आपका व्यापार-व्यवसाय मंदा चल रहा है। किसी भी काम के शुरू करने के बाद उसमें ऐसा लाभ नहीं मिलता जैसा सोच रहे हैं-दुकान खुब सजाधजा कर रखने पर भी उसमें ग्राहक नहीं आते तो अब चिंता की बात नहीं है- हम आपको ऐसे कुछ सिद्ध टोटके बता रहे हैं जिससे थोड़े से प्रयास से आपको बेहतर परिणाम मिलेंगे। लेकिन इन प्रयोगों को करने से पहले आपको मन में कुछ बातें ठाननी पड़ेंगी। एक, हमेशा सत्य बोलेंगे, दूसरों का अहित नहीं करेंगे और तीसरा हमेशा अपना श्रेष्ठतम परिणाम देंगे। जब आप कोई टोटका प्रयोग में ला रहे हों तो इसके बारे में किसी को बताए नहीं, इससे टोटके का प्रभाव कम हो जाता है। इन टोटकों को आजमाइए, लाभ जरूर मिलेगा-







व्यापार बढाने के लिए :-



शुक्ल पक्ष में किसी भी दिन अपनी फैक्ट्री या दुकान के दरवाजे के दोनों तरफ बाहर की ओर थोडा सा गेहूं का आटा रख दें-ध्यान रहे ऐसा करते हुए आपको कोई देखे नही-और पूजा घर में अभिमंत्रित श्री यंत्र रखें-तथा शुक्रवार की रात को सवा किलो काले चने भिगो दें-दूसरे दिन शनिवार को उन्हें सरसों के तेल में बना(घुघरी ) लें- अब उसके तीन हिस्से कर लें- उसमें से एक हिस्सा घोडे या भैंसे को खिला दें- दूसरा हिस्सा कुष्ठ रोगी को दे दें या किसी अपाहिज या गरीब भिखारी को दे दे  और तीसरा हिस्सा अपने सिर से घडी की सूई से उल्टे तरफ तीन बार वार कर किसी चौराहे पर रख दें - यह प्रयोग आप 40 दिन तक करें- कारोबार में लाभ होगा-मगर दुकान में काम करने वाले नौकर को अपशब्द न प्रयोग करे जहाँ तक कोशिश करे कि खुश दिखे -



शनिवार को पीपल के पेड़ से एक पत्ता तोड़ लाएं, उसे धूप-बत्ती दिखाकर अपनी दुकान की गद्दी  जिस पर आप बैठते हैं, उसके नीचे रख दें। सात शनिवार तक लगातार ऐसा ही करें। जब गद्दी  के नीचे सात पत्ते इकट्ठे हो जाएं तो उन्हें एक साथ किसी तालाब या कुएं में बहा दें। व्यवसाय चल निकलेगा-



किसी ऐसी दुकान जो काफी चलती हो वहां से लोहे की कोई कील या नट आदि शनिवार के दिन खरीदकर, मांगकर या उठाकर ले आएं। काली उड़द के 10-15 दानों के साथ उसे एक शीशी में रख लें। धूप-दीप से पूजाकर ग्राहकों की नजरों से बचाकर दुकान में रख लें। व्यवसाय खुब चलेगा-



शनिवार को सात हरी मिर्च और सात नींबू की माला बनाकर दुकान में ऐसे टांगें कि उस पर ग्राहक की नजर पड़े-



व्यापार स्थल पर किसी भी प्रकार की समस्या हो, तो वहां श्वेतार्क गणपति तथा एकाक्षी श्रीफल की स्थापना करें। फिर नियमित रूप से धूप, दीप आदि से पूजा करें तथा सप्ताह में एक बार मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद यथासंभव अधिक से अधिक लोगों को बांटें। भोग नित्य प्रति भी लगा सकते हैं।


यदि आपको लगता है कि आपका कार्य किसी ने बांध दिया है और चाहकर भी उसमें बढ़ोतरी नहीं हो रही है व सब तरफ से मन्दा एवं बाधाओं का सामना करना पड़रहा है। ऐसे में आपको साबुत फिटकरी दुकान में खड़े होकर 31 बार वार दें और दुकान से बाहर निकल कर किसी चौराहे पर जाकर उत्तर दिशा में फेंक कर बिना पीछे देखें वापस आ जाएं। नजरदूर हो जाएगी और व्यापार फिर से पूर्व की भांति चलने लगेगा।


व्यापार व कारोबार में वृद्धि के लिए आप एक नीबू लेकर उस पर चार लौंग गाड़ दें और उसे हाथ में रखकर निम्नलिखित मंत्र का 21 बार जप करें। जप के बाद नीबू को अपनी जेब में रख कर जिनसे कार्य होना हो, उनसे जाकर मिलें।


                               "ओइम क्ली श्री हनुमते नमः"


इसके अतिरिक्त शनिवार को पीपल का एक पत्ता गंगा जल से धोकर हाथ में रख लें और गायत्री मंत्र का 21 बार जप करें। फिर उस पत्ते को धूप देकर अपने कैश बॉक्स में रख दें। यह क्रिया प्रत्येक शनिवार को करें और पत्ता बदल कर पहले के पत्ते को पीपल की जड़ में में रख दें। यह क्रिया निष्ठापूर्वक करें, कारोबार में उन्नति होगी।


आपके व्यापार में मंदी आ गयी है या नौकरी में मंदी आ गयी है तो यह करें। किसी साफ़ शीशी में सरसों का तेल भरकर उस शीशी को किसी तालाब या बहती नदी के जल में डाल दें। शीघ्र ही मंदी का असर जाता रहेगा और आपके व्यापार में जान आ जाएगी।


कारोबार में नुकसान हो रहा हो या कार्यक्षेत्र में झगडा हो रहा हो तो आप अपने वज़न के बराबर कच्चा कोयला लेकर जल प्रवाह कर दें... ! अवश्य लाभ होगा .....!


साथ-साथ ये भी करे व्यापार की सफलता के लिए :-



दुकान के भवन में ईशान कोण को बिल्कुल खाली रखें। पानी की व्यवस्था इस कोण में करें। प्रातः दुकान खोलते वक्त पीने का पानी भरकर रखें व पांच तुलसी के पत्तें इस पानी में डालकर रखें।


पूजा स्थान भी ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में रखें।


ईशान कोण की स्वच्छता ग्राहकों को आकर्षित करती है इसलिए इस स्थान को साफ- सुथरा बनाए रखें।


दुकान में भारी सामान या जूते-चप्पल ईशान कोण में रखें हुए हैं तो तुरन्त हटा दें क्योकिं ये व्यापार में भारी नुकसान करवाने वाला होता हैं। ऐसा कोई सामान यदि है तो उसे दक्षिण-पश्चिम दिशा में व्यवस्थित करें।


दुकान में माल का भण्डारण उत्तर दिशा में करें। लंबे समय तक रखे जाने वाले माल को दक्षिण में, स्टॉक खत्म करने वाले माल को वायव्य कोण में स्थान दें।


अग्नि से संबंधित चीजें बिजली का मीटर, स्विच बोर्ड और इनवर्टर आदि की व्यवस्था आग्नेय कोण में करें।


सीढ़ियां ईशान कोण के अतिरिक्त किसी भी दिशा में रख सकते हैं।


दुकान के मालिक का बैठने का स्थान नैऋत्य कोण में या दक्षिण दिशा में इस प्रकार हो कि मुख पूर्व या उत्तर में रहें।

उपचार और प्रयोग -

Saturday, November 14, 2015

क्या इन अन्धविश्वास में कुछ वैज्ञानिक सत्य है - Scientific truth Some of these superstitions

भारत में कई अंधविश्वास और मान्यताएं हैं जिन्हें या तो धर्म से जोड़ा जाता है या उन्हें विश्वास बताया जाता है। कई लोगों का कहना है कि बिल्ली रास्ता काट दें तो आगे ना जाएं जबकि कई लोगों का मानना है कि कुत्ते के रोने से अनहोनी होती है। आज हमारे बीच कई ऐसे अंधविश्वास है जिनसे रोज आपका सामना होता है। आज हम आपको बता रहे हैं ऐसे ही कुछ अंधविश्वास जो कि हमारे बीच में प्रचलित हैं-





नींबू-मिर्च नींबू मिर्च आप भारत के कई घरों और दुकानों में नींबू मिर्च लटकी हुई देखी होगी। मिर्चो के साथ एक नींबू को लटकाना अच्छा  माना जाता है, लोगों का मानना है कि इससे बुरी नजर नहीं लगती है। लोग मानते है कि ऐसा करने से घर में या व्यवसाय में सुख-समृद्धि वापस आ जाती है-



कहा जाता है कि अगर कुत्ता रोता है तो घर के लिए अशुभ होता है। मान्यता है कि घर के सामने घर की ओर मुंह करके कोई कुत्ता रोए तो उस घर पर किसी प्रकार की विपत्ति आने वाली है या घर के किसी सदस्य की मौत होगी। कहा जाता है कि घर के सामने सुबह के समय यदि कुत्ता रोए तो उस दिन कोई भी महत्वपूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए। यदि किसी मकान की दीवार पर कुत्ता रोते हुए पंजा मारता दिखे तो समझा जाता है कि उस घर में चोरी हो सकती है या कोई संकट आ सकता है।



सपनों से पता चलता है शुभ और अशुभ: अंधविश्वास का सबसे बड़ा उदाहरण है सपनें। लोग सपनों के आधार पर ही अपना भविष्य देख लेते है। कई लोग कहते हैं कि सपने में सांप दिख जाए तो अच्छा होता है, कोई कहता है कि सांप दिख जाए तो अशुभ होता है। हालांकि विज्ञान के अनुसार सपने आने के कई कारण है। साथ अच्छे-बुरे सपने आपकी मानसिक दशा पर निर्भर करते है-

मंगलवार, गुरुवार को बाल कटवाना अशुभ: समाज में पढ़े लिखे लोगों के होने के बाबजूद भी लोग इस अंधविश्वास को सबसे ज्यादा मानते है। कहा जाता है कि मंगलवार, गुरुवार, शनिवार को बाल नहीं कटवाने चाहिए। ऐसा करना अशुभ होता है। इतना ही नहीं अब तो सैलून भी मंगलवार या गुरुवार को बंद रहते हैं-





माना जाता है कि अगर आप किसी काम से जा रहे हैं और कोई टोक दे या पूछे कि कहां जा रहो..? तो इसका मतलब आपका काम नहीं होगा। साथ ही अगर आप कहीं जा रहे हो और अगर आपके पीछे से कोई छींक दे तो आपका काम नहीं होगा। जबकि बछड़ा, बैल, सुहागिन, मेहतर और चूड़ी पहनाने वाला दिखाई दे तो शुभ होता है-




कई लोगों मानना है कि अगर घर के बारह रखे जूतें या चप्पल उल्टे हो जाएं तो उन्हें तुरंत सीधा कर देना चाहिए। ऐसा ना करने पर आपकी किसी से लड़ाई होने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही अगर आप चप्पल सीधी कर रहे हैं तो आपको दूसरी चप्पल का सहारा लेना चाहिए। हालांकि कई लोग जूतें-चप्पलों को नजर उतारने के लिए भी काम में लेते हैं-



हिंदू धर्म में झाड़ू को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि शाम के वक्त और रात में झाड़ू लगाने से लक्ष्मी चली जाती है और व्यक्ति के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं। इसलिए रात को झाड़ू नहीं लगानी चाहिए। साथ ही झाड़ू को खड़ा भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि इससे घर में कलह होता है। खुले स्थान पर झाड़ू रखना अपशकुन माना जाता है इसलिए इसे छिपाकर रखा जाता है-



बांस भले ही कई चीजें बनाने के काम में आता हो, लेकिन भारतीय सभ्यता में बांस को लेकर भी कई अंधविश्वास है। कहा जाता है कि अगर कोई बांस जलाता है तो उसका वंश नष्ट हो जाता है या घर में किसी की म्रत्यु  हो जाती है। हालांकि कई लोग बांस को शुभ मानते हैं-





बंदर का मुंह सुबह देखने से खाना नहीं मिलता..?ऐसे तो बंदर को भगवान हनुमान का प्रतीक माना जाता है, लेकिन माना जाता है कि अगर सुबह-सवेरे बंदर के दर्शन हो जाए तो दिनभर खाना नसीब नहीं होता है। जबकि शाम को बंदर दिख जाए तो शुभ होता है। बंदर का दाहिनी और बिल्ली का बाईं ओर दिखना शुभ होता है-




ऐसी मान्यता हैं कि किसी सुनसान या जंगल की किसी विशेष भूमि कर पेशाब कर देने से भूत पीछे लग जाता है। ऐसे में कुछ लोग पहले थूकते हैं फिर पेशाब करते हैं और कुछ लोग कोई मंत्र वगैरह पढ़कर ऐसा करते हैं। साथ ही लोग नदी, पूल या जंगल की पगडंडी पर पेशाब नहीं करते। भोजन के बाद पेशाब करना और उसके बाद बाईं करवट सोना बड़ा हितकारक है-



हमने अपने जीवन में कई बार करके इन बातो को समझा है और किसी हद तक कहूँ तो कुछ परिणाम सच और सार्थक ही पाया है मगर समझ नहीं आता ये सब अंधविश्वास है  या कोई वैज्ञानिक कारण ...आप ने कभी आजमाया है- कभी इन चीजों को अगर हाँ तो क्या कहेगे आप ....?

उपचार और प्रयोग-

Saturday, November 7, 2015

चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र से बढ़ाएं अपनी नेत्र ज्योति -

बात उन दिनों की है जब हम साधना में नए-नए आये ही थे हमने गुरु श्री निखिलेश्वरानंद जी से दीक्षा ली ही थी कि अचानक इलहाबाद में मेरे एक मिलने वाले थे उनकी किसी कारण से नेत्रों की ज्योति लगभग 70 प्रतिशत समाप्त हो चुकी थी उनका एक अच्छा-ख़ासा रेस्टोरेंट हुआ करता था मुझसे उनकी ये हालत देखी नहीं जा रही थी-




उनका फेसला था कि उनके घर में उनके कारोबार को कोई देखने वाला नहीं था इसलिए रेस्टोरेंट को बंद करने का विचार बना चुके थे तभी मुझे गुरदेव से प्राप्त हुई "चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र" का ख़याल आया कि क्यों न इसका उपयोग करके  इसके जीवन में रोशनी कि एक नई किरण का संचार किया जाए।

बस उस वक्त हमने इस प्रयोग को सम्पन्न किया और सफल पाया आज आपके सामने हम इस प्रयोग का वर्णन करने जा रहे है। ताकि पीड़ित व्यक्ति के लिए कोई भी संकल्प ले के उसके लाभ के लिए प्रयोग श्रधा और विश्वास से करके उसे लाभ करा सकता है .

आपकी नेत्र ज्योति कमजोर है और बचपन में ही आपको चश्मा पहनना पड़  गया है तो इस चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र के नियमित जप से आप भी अपनी नेत्र ज्योति (Eye Sight)  ठीक कर सकते हैं।  यह चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र इतना प्रभाव शाली है की यदि आपको आँखों से सम्बंधित कोई बीमारी है तो अगर एक ताम्बे के लोटे में जल भरकर, पूजा स्थान में रखकर उसके सामने नियमित इस स्तोत्र के २१ बार पाठ करने के उपरान्त उस जल से दिन में ३-४ बार आँखों को छींटे मारने पर कुछ ही समय में नेत्र रोग से मुक्ति मिल जाती है।  बस आवश्यकता है , श्रद्धा, विश्वास एवं अनुष्ठान आरम्भ करने की।


आईये इस स्तोत्र  को जानते हैं:-



किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष  रविवार को सूर्योदय के आसपास आरम्भ करके रोज इस स्तोत्र के ५ पाठ करें।

सर्वप्रथम भगवान सूर्य नारायण का ध्यान करके दाहिने हाथ में जल, अक्षत, लाल पुष्प लेकर विनियोग मंत्र पढ़े-

विनियोग मंत्र :-



ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुधन्य ऋषिः गायत्री छन्दः सूर्यो देवता चक्षुरोगनिवृत्तये  विनियोगः।


भावार्थ :-

'ॐ इस चाक्षुषी विद्या क ऋषि अहिर्बुध्न्य हैं, गायत्री छन्द है, सूर्यनारायण देवता हैं तथा नेत्ररोग  शमन हेतु इसका जाप होता है।

अब इस चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र का पाठ आरम्भ करें-


 " ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव।  मां पाहि पाहि। त्वरितम् चक्षुरोगान शमय शमय। मम जातरूपम् तेजो दर्शय दर्शय।  यथाहम अन्धो न स्यां कल्पय कल्पय।  कल्याणम कुरु कुरु।  यानि मम पूर्वजन्मोपार्जितानी चक्षुः प्रतिरोधकदुष्क्रतानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय।  ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय।  ॐ नमः करुणाकरायामृताय।  ॐ नमः सूर्याय।  ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः।  खेचराय नमः।  महते नमः।  रजसे नमः।  तमसे नमः।  असतो मां सदगमय।  तमसो मां ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय।  उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः।  हंसो भगवान शुचिरप्रतिरूपः।  य इमां चक्षुष्मतिविद्यां  ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुल अन्धो भवति।  अष्टौ ब्राह्मणान ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति। "

हिंदी भावार्थ :-


"हे परमेश्वर, हे चक्षु के अभिमानी सूर्यदेव। आप मेरे चक्षुओं में चक्षु के तेजरूप से स्थिर हो जाएँ। मेरी रक्षा करें। रक्षा करें। मेरी आँखों का रोग समाप्त करें। समाप्त करें। मुझे आप अपना सुवर्णमयी तेज दिखलायें। दिखलायें। जिससे में अँधा न होऊं। कृपया वैसे ही उपाय करें, उपाय करें। आप मेरा कल्याण करें, कल्याण करें। मेरे जितने भी पीछे जन्मों के पाप हैं जिनकी वजह से मुझे नेत्र रोग हुआ है उन पापों को जड़ से उखाड़ दे, दें। हे सच्चिदानन्दस्वरूप नेत्रों को तेज प्रदान करने वाले दिव्यस्वरूपी भगवान भास्कर आपको नमस्कार है। ॐ सूर्य भगवान को नमस्कार है। ॐ नेत्रों के प्रकाश भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है। ॐ आकाशविहारी आपको नमस्कार है। परमश्रेष्ठ स्वरुप आपको नमस्कार है। ॐ रजोगुण रुपी भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है। तमोगुण के आश्रयभूत भगवान सूर्यदेव आपको नमस्कार है। हे भगवान आप मुझे असत से सत की और  जाईये। अन्धकार से प्रकाश की और ले जाइये। मृत्यु से अमृत की और ले चलिये। हे सूर्यदेव आप उष्णस्वरूप हैं, शुचिरूप हैं। हंसस्वरूप भगवान सूर्य, शुचि तथा अप्रतिरूप रूप हैं। उनके तेजोमयी स्वरुप की समानता करने वाला कोई भी नहीं है। जो ब्राह्मण इस चक्षुष्मतिविद्या का नित्य पाठ करता है उसे कभी नेत्र सम्बन्धी रोग नहीं होता है। उसके कुल में कोई अँधा नहीं होता। आठ ब्राह्मणो को इस विद्या को देने (सिखाने) पर इस विद्या की सिद्धि प्राप्त हो जाती है। "

इस मन्त्र पाठ के समय एक कांसे की थाली में पानी रख ले उस थाली में अक्षत और गुडहल (सूर्य को प्रिय )डाले और उसमे सूर्य का प्रतिबिम्ब देखते हुए मन्त्र जप करे एवं मन्त्र समाप्ति के बाद थाली में रक्खे जल से रोगी के आँखों का प्रक्षालन करे तथा हर रविवार को ब्रत रक्खे और एक समय फलाहार करे . रविवार को 11 बार इसी मन्त्र से हवन सूर्य को अर्पित करे तथाआहुति गाय के देशी घी की दे  .ये प्रयोग कम से कम 13 रविवार करना चाहिए . प्रयोग समाप्त होते -होते आँखों के 70 प्रतिशत रोग समाप्त हो जाते है और उसके एक माह बाद व्यक्ति पूर्णत स्वस्थ हो जाता है ये मेरा आजमाया हुआ प्रयोग है और सफल भी हुआ है बीच में किसी भी कारण ये प्रयोग खंडित होने पे दुबारा करने का प्रविधान है प्रयोग को रविपुष्य योग में आरम्भ करने से सफलता निश्चित रूप से प्राप्त होती है .

नेत्र रोग शमन के लिए अन्य उपयोगी सूर्य साधनाएं :-



नेत्र रोग से पीड़ित व्यक्ति प्रतिदिन सुबह हल्दी के घोल से अनार की कलम से  दिए गए यन्त्र को कांसे की थाली में बनाये। फिर उस यंत्र पर तांबे की थाली में चतुर्मुख (चार बत्ती वाला) घी का दीपक जलाये। फिर लाल पुष्प, चावल, चन्दन आदि से इस यन्त्र की पूजा करें। इसके बाद पूर्व दिशा की और मुख करके बैठ जाएँ। और हल्दी की माला से "ॐ ह्रीं हंसः" इस मन्त्र की ७ माला जाप करें।  उसके पश्चात ऊपर लिखा चाक्षुषोपनिषद स्तोत्र  12 पाठ करें व अन्त में "ॐ ह्रीं हंसः" मन्त्र की पुनः ७ माला जाप करें। इसके बाद भगवान सूर्य को सिन्दूर मिश्रित जल से अर्घ्य दें व अपना नेत्र रोग की ठीक होने की प्रार्थना करें।


नेत्र रोग को ठीक करने हेतु इस अक्ष्युपनिषद स्तोत्र का पाठ भी अत्यंत लाभकारी है।

"हरिः ॐ। अथ ह सांकृतिर्भगवानादित्यलोकम जगाम। स आदित्यं नत्वा चक्षुष्मतिविद्यया तमस्तुवत। ॐ नमो भगवते श्रीसूर्यायाक्षितेजसे नमः। ॐ खेचराय नमः। ॐ महासेनाय नमः। ॐ तमसे नमः। ॐ रजसे नमः ॐ सत्वाय नमः। ॐ असतो मा सद गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय। हंसो भगवाञ्छुचिरूपः अप्रतिरूपः। विश्वरूपम घृणिनं जातवेदसं हिरण्यमयं ज्योतिरूपं तपन्तम्। सहस्र रश्मिः शतधा वर्तमानः पुरः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः। ॐ नमो भगवते श्री सूर्यायादित्या याक्षितेजसे अहोवाहिनी वाहिनी स्वाहेति। एवं चक्षुष्मतिविद्यया स्तुतः श्रीसूर्यनारायणः सुप्रीतो ब्रवीच्चक्षुमतिविद्यां ब्राह्मणो यो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति। अष्टौ ब्राह्ममाण ग्राहयित्वाथ विद्यासिद्धिर्भवति।  य एवं वेद स महान भवति।"

उपचार और प्रयोग -

कैसे जाए यदि दिशा शूल है - Kese Jaaye Yadi Disha Shool Hai

क्यों बड़े बुजुर्ग तिथि देख कर आने जाने की रोक टोक करते हैं ?आज की युवा पीढ़ी भले हि उन्हें आउटडेटेड कहे -लेकिन बड़े सदा बड़े ही रहते हैं -इसलिए आदर करे उनकी बातों का - क्युकि कल आपको भी आपके बच्चे आउटडेटेड बनाने वाले है -दिशाशूल समझने से पहले हमें दस दिशाओं के विषय में ज्ञान होना आवश्यक है-









हम सबने पढ़ा है कि दिशाएं 4  होती हैं -

पूर्व

पश्चिम

उत्तर

दक्षिण

परन्तु जब हम उच्च शिक्षा ग्रहण करते हैं तो ज्ञात होता है कि वास्तव में दिशाएँ दस होती हैं |

पूर्व

पश्चिम

उत्तर

दक्षिण

उत्तर - पूर्व

उत्तर - पश्चिम

दक्षिण – पूर्व

दक्षिण – पश्चिम

आकाश

पाताल

हमारे सनातन धर्म के ग्रंथो में सदैव 10 दिशाओं का ही वर्णन किया गया है,जैसे हनुमान जी ने युद्ध इतनी आवाज की कि उनकी आवाज दसों दिशाओं में सुनाईदी -हम यह भी जानते हैं कि प्रत्येक दिशा के देवता होते हैं -

दसों दिशाओं को समझने के पश्चात अब हम बात करते हैं वैदिक ज्योतिष की ज्योतिष शब्द “ज्योति” से बना है जिसका भावार्थ होता है “प्रकाश” 

वैदिक ज्योतिष में अत्यंत विस्तृत रूप में मनुष्य के जीवन की हरपरिस्तिथियों से सम्बन्धित विश्लेषण किया गया है कि मनुष्य यदि इसको तनिक भी समझले तो वह अपने जीवन में उत्पन्न होने वाली बहुत सी समस्याओं से बचसकता है और अपना जीवन सुखी बना सकता है -

आप जब भी बाहर की यात्रा के लिए जाए तो कार्य सफलता के लिए दिशा शूल का विचार करके जाए -ताकि आने वाली परेशानी से बचा जा सके -


किस दिन कहाँ न जाए-



सोमवार और शनिवार को पूर्व दिशा

रविवार और शुक्रवार को पश्चिम दिशा

मंगल वार और बुधवार को उत्तर दिशा

गुरु वार को दक्षिण दिशा

सोमवार और गुरूवार को (अग्ने ) south east

रविवार और शुक्रवार को (नेतरअगये ) south west

मंगलवार को (वायवे ) north west

बुध और शनि को (ईशान ) north east----दिशा शूल होता है

अर्थात इस दिन इन दिशायो की और यात्रा नहीं करनी चाहिए...

बुध को उत्तर दिशा का स्वामी होते हुए भी बुधवार को उत्तर दिशा की यात्रा निषेध है-


विशेष:-



यदि एक जगह से रवाना हो कर उसी दिन गंतव्य स्थान पर पहुंचं जाना तय हो तो ऐसी यात्रा में तिथि- वार नक्षत्र,दिशा-शूल,प्रतिशुक,योगनी आदि का विचार नहीं होता है -


आपातकालीन यात्रा :-



यदि फिर भी किसी कारन वश आपातकालीन यात्रा करनी पड ही जाये और दिशा शूल भी हो, तो नीचे  लिखे उपाए कर के यात्रा कर सकते है-

रविवार = दलिया और घी

सोमवार = दर्पण देख कर

मंगलवार = गुड खा कर

बुधवार = धनिया या तिल खा कर

वीरवार = दही खा कर

शुक्रवार = जों खा कर

शनिवार = अदरक या उड़द खा कर

ये करके दिशा शूल के प्रकोप से बचा जा सकता है| और आप अपनी यात्रा को सुखद पूर्वक और मंगलमय बना सकते है-

उपचार और प्रयोग-

Friday, November 6, 2015

कभी न रक्खे ये छ चीजे घर में - Never Please enter these six things in the house

हम अपने घर को सुंदर दिखाने के लिए हम कई शोपीस लगाते हैं लेकिन कई बार ये नुकसादायक हो सकते हैं क्युकि हमें इनके प्रभाव का पता नहीं होता है -




भारतीय वास्तु विज्ञान चाइनीज फेंगसुई से काफी मिलता-जुलता है। यह प्राकृतिक शक्तियों को मनुष्य के लिए उपयोगी बनाने का एक कलात्मक परंपरा है। हम अक्सर सुनते आए हैं कि घर में क्या रखना अच्छा होता है और क्या रखना बुरा। आज आपको बताते हैं कि घर में कौन सी 6 चीजें कभी नहीं रखनी चाहिए-



महाभारत की तस्वीरें या प्रतीक (Picture or symbol of the Mahabharata )




महाभारत को भारत के इतिहास का सबसे भीषण युद्ध माना जाता है। कहते हैं कि इस युद्ध के प्रतीकों, मसलन तस्वीर या रथ इत्यादि को घर में रखने से घर में क्लेश बढ़ता है। यही नहीं, महाभारत ग्रंथ भी घर से दूर ही रखने की सलाह दी जाती है-





नटराज की मूर्ति (Nataraja statue )



नटराज नृत्य कला के देवता हैं। लगभग हर क्लासिकल डांसर के घर में आपको नटराज की मूर्ति रखी मिल जाती है। लेकिन नटराज की इस मूर्ति में भगवान शिव श्तांडव नृत्य की मुद्रा में हैं जो कि विनाश का परिचायक है। इसलिए इसे घर में रखना भी अशुभ फलकारक होता है-



ताजमहल (Taj Mahal )



ताजमहल प्रेम का प्रतीक तो है, लेकि न साथ ही वह मुमताज की कब्रगाह भी है। इसलिए ताजमहल की तस्वीर या उसका प्रतीक घर में रखना नकारात्मकता फैलाता है। माना जाता है कि ऎसी चीजें घर पर रखी होने से हमारे जीवन पर बहुत गलत असर पड़ सकता है। यह सीधे-सीधे मौत से जुड़ा है इसलिए इसे घर पर न रखें-


डूबती हुई नाव या जहाज (Sinking boat or ship)



डूबती नाव अगर घर में रखी हो तो अपने साथ आपका सौभाग्य भी डुबा ले जाती है। घर में रखी डूबती नाव की तस्वीर या कोई शोपीस सीधा आपके घर के रिश्तों पर आघात करता है। रिश्तों में डूबते मूल्यों का प्रतीक है यह चिह्न। इसे अपने घर से दूर रखें-






फव्वारा (Fountain)



फव्वारे या फाउन्टन आपके घर की खूबसूरती तो बढ़ाते हैं लेकिन इसके बहते पानी के साथ आपका पैसा और समृद्धि भी बह जाती है। घर में फाउन्टन रखना शुभ नहीं होता-












जंगली जानवरों का कोई प्रतीक (A symbol of wild animals)


किसी जंगली जानवर की तस्वीर या शो पीस घर पर रखना भी अच्छा नहीं माना जाता। इससे घर में रहने वालों का स्वभाव उग्र होने लगता है। घर में क्लेश और बेतरतीबी बढ़ती है।







और अधिक जाने-ज्योतिष-वास्तुशास्त्र-मन्त्र-तंत्र-यंत्र 

उपचार और प्रयोग-

Sunday, November 1, 2015

दूसरी स्त्री के प्रति आसक्ति दूर करे - To remove the attachment to another woman

अगर आपके पति किसी अन्य स्त्री पर आसक्त हैं और आप से लड़ाई-झगड़ा इत्यादि करते हैं पति स्वभाव ही चंचल प्रवर्ती का होता है बहुत कम लोग है जो इनसे भिन्न है जरा सा भी सुन्दरता या आकर्षण से उस ओर खिचे चले जाते है इस प्रकार के पतियों के लिए जो अन्य स्त्री के मोहजाल में फंस गये हों या आपस में प्रेम नहीं रखते हों तथा  लड़ाई-झगड़ा करते हों तो इस प्रयोग  द्वारा पति को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है-



अगर आपके पति किसी अन्य स्त्री पर आसक्त हैं और आप से लड़ाई-झगड़ा इत्यादि करते हैं। तो यह प्रयोग आपके लिए बहुत कारगर है प्रत्येक रविवार को अपने घर तथा शयनकक्ष में गूगल की धूनी दें-धूनी करने से पहले उस स्त्री का नाम लें और यह कामना करें कि आपके पति उसके चक्कर से शीघ्र ही छूट जाएं। श्रद्धा-विश्वास के साथ करने से निश्चिय ही आपको लाभ मिलेगा।

जिन स्त्रियों के पति किसी अन्य स्त्री के मोहजाल में फंस गये हों या आपस में प्रेम नहीं रखते हों, लड़ाई-झगड़ा करते हों तो इस टोटके द्वारा पति को अनुकूल बनाया जा सकता है।

गुरुवार अथवा शुक्रवार की रात्रि में १२ बजे पति की चोटी (शिखा) के कुछ बाल काट लें और उसे किसी ऐसे स्थान पर रख दें जहां आपके पति की नजर न पड़े। ऐसा करने से आपके पति की बुद्धि का सुधार होगा और वह आपकी बात मानने लगेंगे। कुछ दिन बाद इन बालों को जलाकर अपने पैरों से कुचलकर बाहर फेंक दें। मासिक धर्म के समय करने से अधिक कारगर सिद्ध होगा।

शुक्ल पक्ष के प्रथम रविवार को प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर अपने पूजन स्थल पर आएं। एक थाली में केसर से स्वस्तिक बनाकर गंगाजल से धुला हुआ मोती शंख स्थापित करें और गंध, अक्षत पुष्पादि से इसका पूजन करें। पूजन के समय गोघृत का दीपक जलाएं और निम्नलिखित मंत्र का 1 माला जप स्फटिक की माला पर करें। श्रद्धा-विश्वास पूर्वक 1 महीने जप करने से किसी भी व्यक्ति विशेष का मोहन-वशीकरण एवं आकर्षण होता है। जिस व्यक्ति का नाम, ध्यान करते हुए जप किया जाए वह व्यक्ति साधक का हर प्रकार से मंगल करता है। यह प्रयोग निश्चय ही कारगर सिद्ध होता है।

मंत्र : ऊँ क्रीं वांछितं मे वशमानय स्वाहा।''

पति-पत्नी के बीच वैमनस्यता को दूर करने हेतु :-


रात को सोते समय पत्नी पति के तकिये में सिंदूर की एक पुड़िया और पति पत्नी के तकिये में कपूर की दो टिकियां रख दें। प्रातः होते ही सिंदूर की पुड़िया घर से बाहर फेंक दें तथा कपूर को निकाल कर उस कमरे जला दें।


पति को वश में करने के लिए :-


ये प्रयोग किसी भी माह के शुक्ल पक्ष से आरम्भ करे आप एक पान का पत्ता ले कर उसके उपर चन्दन पावडर और केसर पावडर को मिला कर रक्खे तथा दुर्गा माँ की फोटो के सामने चढ़ाये माता जी की फोटो के सामने बैठ कर चँडी स्त्रोत का पाठ 43 दिन तक करें तदुपरांत पाठ करने के उसी चन्दन और केसर का तिलक आप माथे पे लगा कर पति के सामने जाए यदि किसी कारण से पति घर पे न हो तो उनकी तस्वीर के समक्ष जाए  पान का पता रोज़ नया लें जो कि साबुत हो कहीं से कटा फटा न हो - रोज़ प्रयोग किए गए पान के पत्ते को अलग किसी स्थान पर रखें - 43 दिन के बाद उन पान के पत्तों को जल प्रवाह कर दें - शीघ्र समस्या का समाधान होगा -

शनिवार की रात्रि में 7 लौंग लेकर उस पर 21 बार जिस व्यक्ति को वश में करना हो उसका नाम लेकर फूंक मारें और अगले रविवार को इनको आग में जला दें। यह प्रयोग लगातार 7 बार करने से अभीष्ट व्यक्ति का वशीकरण होता है।

उपचार और प्रयोग -

Monday, October 26, 2015

शंख से घर में आये सुख-शांति और रोगों से मुक्ति -

हमारे हिन्दू धर्म में शंख को पवित्र और शुभ फलदायी माना गया है। इसलिए पूजा-पाठ में शंख बजाने का नियम है हम अगर इसके धार्मिक पहलू को दर किनार भी कर दें तो भी घर में शंख रखने और इसे नियमित तौर पर बजाने के ऐसे कई फायदे हैं जो सीधे तौर पर हमारी सेहत और घर की सुख-शांति से जुड़े हैं-





ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं-


कल्याणकारी शंख दैनिक जीवन में दिनचर्या को कुछ समय के लिए विराम देकर मौन रूप से देव अर्चना के लिए प्रेरित करता है। यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। समुद्री प्राणी का खोल शंख कितना चमत्कारी हो सकता है-


हिन्दू धर्म में पूजा स्थल पर शंख रखने की परंपरा है क्योंकि शंख को सनातन धर्म का प्रतीक माना जाता है। शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नव -निधियों में शंख का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू धर्म में शंख का महत्त्व अनादि काल से चला आ रहा है। शंख का हमारी पूजा से निकट का सम्बन्ध है।


यहाँ तक कहा जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर साधारण जल भी गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता है। मन्दिर में शंख में जल भरकर भगवान की आरती की जाती है। आरती के बाद शंख का जल भक्तों पर छिड़का जाता है जिससे वे प्रसन्न होते हैं। जो भगवान कृष्ण को शंख में फूल, जल और अक्षत रखकर उन्हें अर्ध्य देता है, उसको अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है।


शंख में जल भरकर "ऊँ नमोनारायण"  का उच्चारण करते हुए भगवान को स्नान कराने से पापों का नाश होता है।


सभी धार्मिक कृत्यों में शंख का उपयोग किया जाता है। पूजा-आराधना, अनुष्ठान-साधना, आरती, महायज्ञ एवं तांत्रिक क्रियाओं के साथ शंख का वैज्ञानिक एवं आयुर्वेदिक महत्त्व भी है।


हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। कुछ गुह्य साधनाओं में इसकी अनिवार्यता होती है। शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। शंख को विजय, समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। वैदिक अनुष्ठानों एवं तांत्रिक क्रियाओं में भी विभिन्न प्रकार के शंखों का प्रयोग किया जाता है।


शंख कई प्रकार के होते हैं और सभी प्रकारों की विशेषता एवं पूजन-पद्धति भिन्न-भिन्न है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर, मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं। शंख की आकृति (उदर) के आधार पर इसके प्रकार माने जाते हैं।


ये तीन प्रकार के होते हैं :-




दक्षिणावृत्ति शंख

मध्यावृत्ति शंख

वामावृत्ति शंख


जो शंख दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है, वह दक्षिणावृत्ति शंख कहलाता है। जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है, वह मध्यावृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बायें हाथ से पकड़ा जाता है, वह वामावृत्ति शंख कहलाता है।


शंख का उदर दक्षिण दिशा की ओर हो तो दक्षिणावृत्त और जिसका उदर बायीं ओर खुलता हो तो वह वामावृत्त शंख है। मध्यावृत्ति एवं दक्षिणावृति शंख सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं। हिन्दुओं के 33 करोड़ देवता हैं। सबके अपने- अपने शंख हैं। देव-असुर संग्राम में अनेक तरह के शंख निकले, इनमे कई सिर्फ़ पूजन के लिए होते है।


समुद्र मंथन के समय देव- दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई। जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ।

गणेश शंख :-




जिनमें सर्वप्रथम पूजित देव गणेश के आकर के गणेश शंख का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गणेश शंख कहा जाता है। इसे प्रकृति का चमत्कार कहें या गणेश जी की कृपा की इसकी आकृति और शक्ति हू-ब-हू गणेश जी जैसी है। गणेश शंख प्रकृति का मनुष्य के लिए अनूठा उपहार है। निशित रूप से वे व्यक्ति परम सौभाग्यशाली होते हैं जिनके पास या घर में गणेश शंख का पूजन दर्शन होता है। भगवान गणेश सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। इनके अनेक स्वरूपों में यथा- विघ्न नाशक गणेश, दरिद्रतानाशक गणेश, कर्ज़ मुक्तिदाता गणेश, लक्ष्मी विनायक गणेश, बाधा विनाशक गणेश, शत्रुहर्ता गणेश, वास्तु विनायक गणेश, मंगल कार्य गणेश आदि- आदि अनेकों नाम और स्वरुप गणेश जी के जन सामान्य में व्याप्त हैं। गणेश जी की कृपा से सभी प्रकार की विघ्न- बाधा और दरिद्रता दूर होती है।


जहाँ दक्षिणावर्ती शंख का उपयोग केवल और केवल लक्ष्मी प्राप्ति के लिए किया जाता है। वही श्री गणेश शंख का पूजन जीवन के सभी क्षेत्रों की उन्नति और विघ्न बाधा की शांति हेतु किया जाता है। इसकी पूजा से सकल मनोरथ सिद्ध होते है। गणेश शंख आसानी से नहीं मिलने के कारण दुर्लभ होता है। सौभाग्य उदय होने पर ही इसकी प्राप्ति होती है।


आर्थिक, व्यापारिक और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति पाने का श्रेष्ठ उपाय श्री गणेश शंख है। अपमान जनक कर्ज़ बाधा इसकी स्थापना से दूर हो जाती है। इस शंख की आकृति भगवान गणपति के सामान है। शंख में निहित सूंड का रंग अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्य युक्त है। प्रकृति के रहस्य की अनोखी झलक गणेश शंख के दर्शन से मिलती है।


विधिवत सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित गणेश शंख की स्थापना चमत्कारिक अनुभूति होती ही है। किसी भी बुधवार को प्रातः स्नान आदि से निवृत्ति होकर विधिवत प्राण प्रतिष्ठित श्री गणेश शंख को अपने घर या व्यापार स्थल के पूजा घर में रख कर धूप- दीप पुष्प से संक्षिप्त पूजन करके रखें। ये अपने आप में चैतन्य शंख है। इसकी स्थापना मात्र से ही गणेश कृपा की अनुभूति होने लगाती है। इसके सम्मुख नित्य धूप- दीप जलना ही पर्याप्त है किसी जटिल विधि- विधान से पूजा करने की जरुरत नहीं है। बस एक बार किसी योग्य विद्धवान से एक बार स्थापना करा ले -


महालक्ष्मी शंख :-




इसका आकार श्री यंत्र क़ी भांति होता है। इसे प्राक्रतिक श्री यंत्र भी माना जाता है। जिस घर में इसकी पूजा विधि विधान से होती है वहाँ स्वयं लक्ष्मी जी का वाश होता है। इसकी आवाज़ सुरीली होती है। विद्या क़ी देवी सरस्वती भी शंख धारण करती है। वे स्वयं वीणा शंख कि पूजा करती है। माना जाता है कि इसकी पूजा वा इसके जल को पीने से मंद बुद्धि व्‍यक्ति भी ज्ञानी हो जाता है।


दक्षिणावर्ती शंख:-




स्वयं भगवान विष्णु अपने दाहिने हाथ में दक्षिणावर्ती शंख धारण करते है। पुराणों के अनुसार समुद्र मंथन के समय यह शंख निकला था। जिसे स्वयं भगवान विष्णु जी ने धारण किया था। यह ऐसा शंख है जिसे बजाया नहीं जाता, इसे सर्वाधिक शुभ माना जाता है।


शंख की उत्पत्ति:-



शंख की उत्पत्ति संबंधी पुराणों में एक कथा वर्णित है। सुदामा नामक एक कृष्ण भक्त पार्षद राधा के शाप से शंखचूड़ दानवराज होकर दक्ष के वंश में जन्मा। अन्त में [विष्णु] ने इस दानव का वध किया। शंखचूड़ के वध के पश्चात्‌ सागर में बिखरी उसकी अस्थियों से शंख का जन्म हुआ और उसकी आत्मा राधा के शाप से मुक्त होकर गोलोक वृंदावन में श्रीकृष्ण के पास चली गई।


भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि इसका प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ था। समुद्र-मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से छठवां रत्न शंख था। अन्य 13 रत्नों की भांति शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद थे। विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है। अत यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है।


इन्हीं कारणों से शंख की पूजा भक्तों को सभी सुख देने वाली है। शंख की उत्पत्ति के संबंध में हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु आग से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्व से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी जाती है।


भागवत पुराण के अनुसार, संदीपन ऋषि आश्रम में श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ। कृष्ण ने समुद्र तट पर शंखासुर को मार गिराया। उसका खोल शेष रह गया। माना जाता है कि उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। पांचजन्य शंख वही था।


पौराणिक कथाओं के अनुसार, शंखासुर नामक असुर को मारने के लिए श्री विष्णु ने मत्स्यावतार धारण किया था। शंखासुर के मस्तक तथा कनपटी की हड्डी का प्रतीक ही शंख है। उससे निकला स्वर सत की विजय का प्रतिनिधित्व करता है।


शिव पुराण के अनुसार शंखचूड नाम का महापराक्रमी दैत्य हुआ। शंखचूड दैत्यराम दंभ का पुत्र था। दैत्यराज दंभ को जब बहुत समय तक कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई तब उसने विष्णु के लिए घोर तप किया और तप से प्रसन्न होकर विष्णु प्रकट हुए। विष्णु ने वर मांगने के लिए कहा तब दंभ ने एक महापराक्रमी तीनों लोको के लिए अजेय पुत्र का वर मांगा और विष्णु तथास्तु बोलकर अंतध्र्यान हो गए। तब दंभ के यहां शंखचूड का जन्म हुआ और उसने पुष्कर में ब्रह्मा की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न कर लिया। ब्रह्मा ने वर मांगने के लिए कहा और शंखचूड ने वर मांगा कि वो देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्मा ने तथास्तु बोला और उसे श्री कृष्ण कवच दिया फिर वे अंतध्र्यान हो गए। जाते-जाते ब्रह्मा ने शंखचूड को धर्मध्वज की कन्या तुलसी से विवाह करने की आज्ञा दी। ब्रह्मा की आज्ञा पाकर तुलसी और शंखचूड का विवाह हो गया। ब्रह्मा और विष्णु के वर के मद में चूर दैत्यराज शंखचूड ने तीनों लोकों पर स्वामित्व स्थापित कर लिया। देवताओं ने त्रस्त होकर विष्णु से मदद मांगी परंतु उन्होंने खुद दंभ को ऐसे पुत्र का वरदान दिया था अत: उन्होंने शिव से प्रार्थना की। तब शिव ने देवताओं के दुख दूर करने का निश्चय किया और वे चल दिए। परंतु श्रीकृष्ण कवच और तुलसी के पतिव्रत धर्म की वजह से शिवजी भी उसका वध करने में सफल नहीं हो पा रहे थे तब विष्णु से ब्राह्मण रूप बनाकर दैत्यराज से उसका श्रीकृष्ण कवच दान में ले लिया और शंखचूड का रूप धारण कर तुलसी के शील का अपहरण कर लिया। अब शिव ने शंखचूड को अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया और उसकी हड्डियों से शंख का जन्म हुआ। चूंकि शंखचूड विष्णु भक्त था अत: लक्ष्मी-विष्णु को शंख का जल अति प्रिय है और सभी देवताओं को शंख से जल चढ़ाने का विधान है। परंतु शिव ने चूंकि उसका वध किया था अत: शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।


प्राचीन काल से ही प्रत्येक घर में पूजा-वेदी पर शंख की स्थापना की जाती है। निर्दोष एवं पवित्र शंख को दीपावली, होली, महाशिवरात्रि, नवरात्र, रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य नक्षत्र आदि शुभ मुहूर्त में विशिष्ट कर्मकांड के साथ स्थापित किया जाता है। रुद्र, गणेश, भगवती, विष्णु भगवान आदि के अभिषेक के समान शंख का भी गंगाजल, दूध, घी, शहद, गुड़, पंचद्रव्य आदि से अभिषेक किया जाता है। इसका धूप, दीप, नैवेद्य से नित्य पूजन करना चाहिए और लाल वस्त्र के आसन में स्थापित करना चाहिए।


शंखराज सबसे पहले वास्तु-दोष दूर करते हैं। मान्यता है कि शंख में कपिला (लाल) गाय का दूध भरकर भवन में छिड़काव करने से वास्तुदोष दूर होते हैं। परिवार के सदस्यों द्वारा आचमन करने से असाध्य रोग एवं दुःख-दुर्भाग्य दूर होते हैं। विष्णु शंख को दुकान, ऑफिस, फैक्टरी आदि में स्थापित करने पर वहाँ के वास्तु-दोष दूर होते हैं तथा व्यवसाय आदि में लाभ होता है। शंख की स्थापना से घर में लक्ष्मी का वास होता है।


स्वयं माता लक्ष्मी कहती हैं कि शंख उनका सहोदर भ्राता है। शंख, जहाँ पर होगा, वहाँ वे भी होंगी। देव प्रतिमा के चरणों में शंख रखा जाता है। पूजास्थली पर दक्षिणावृत्ति शंख की स्थापना करने एवं पूजा-आराधना करने से माता लक्ष्मी का चिरस्थायी वास होता है। इस शंख की स्थापना के लिए नर-मादा शंख का जोड़ा होना चाहिए। गणेश शंख में जल भरकर प्रतिदिन गर्भवती नारी को सेवन कराने से संतान गूंगेपन, बहरेपन एवं पीलिया आदि रोगों से मुक्त होती है। अन्नपूर्णा शंख की व्यापारी व सामान्य वर्ग द्वारा अन्नभंडार में स्थापना करने से अन्न, धन, लक्ष्मी, वैभव की उपलब्धि होती है। मणिपुष्पक एवं पांचजन्य शंख की स्थापना से भी वास्तु-दोषों का निराकरण होता है। शंख का तांत्रिक-साधना में भी उपयोग किया जाता है। इसके लिए लघु शंखमाला का प्रयोग करने से शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है।


आइये जानें शंख बजाने और इसके इस्तेमाल के फायदे:-




शंख का महत्त्व धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, वैज्ञानिक रूप से भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख-ध्वनि के प्रभाव में सूर्य की किरणें बाधक होती हैं। अतः प्रातः व सायंकाल में जब सूर्य की किरणें निस्तेज होती हैं, तभी शंख-ध्वनि करने का विधान है। इससे आसपास का वातावरण तता पर्यावरण शुद्ध रहता है। आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियाँ, पीलिया, कास प्लीहा यकृत, पथरी आदि रोग ठीक होते हैं।


तंत्र शास्त्र के अनुसार सीधे हाथ की तरफ खुलने वाले शंख को यदि पूर्ण विधि-विधान के साथ करके इस शंख को लाल कपड़े में लपेटकर अपने घर में अलग- अलग स्थान पर रखने से विभिन्न परेशानियों का हल हो सकता है। दक्षिणावर्ती शंख को तिज़ोरी मे रखा जाए तो घर में सुख-समृद्धि बढ़ती है। इसलिए घर में शंख रखा जाना शुभ माना जाता है।


लक्ष्मी के हाथ में जो शंख होता है वो दक्षिणावर्ती अर्थात सीधे हाथ की तरफ खुलने वाले होते हैं। वामावर्ती शंख को जहां विष्णु का स्वरुप माना जाता है और दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है। दक्षिणावृत्त शंख घर में होने पर लक्ष्मी का घर में वास रहता है।


वर्तमान समय में वास्तु-दोष के निवारण के लिए जिन चीज़ों का प्रयोग किया जाता है, उनमें से यदि शंख आदि का उपयोग किया जाए तो कई प्रकार के लाभ हो सकते हैं। यह न केवल वास्तु-दोषों को दूर करता है, बल्कि आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह में विलंब जैसे अनेक दोषों का निराकरण एवं निवारण भी करता है।


मान्यता है कि छोटे-छोटे बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बाँधने तथा शंख में जल भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी-दोष नहीं रहता है। बच्चा स्वस्थ रहता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास रोगी हमेशा शंख बजायें तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं।


शंख के जल से शालीग्राम को स्नान कराएं और फिर उस जल को यदि गर्भवती स्त्री को पिलाया जाए तो पैदा होने वाला शिशु पूरी तरह स्वस्थ होता है। साथ ही बच्चा कभी मूक या हकला नहीं होता। यदि कोई बोलने में असमर्थ है या उसे हकलेपन का दोष है तो शंख बजाने से ये दोष दूर होते हैं। शंख बजाने से कई तरह के फेफड़ों के रोग दूर होते हैं जैसे दमा, कास प्लीहा यकृत और इन्फ्लून्जा आदि रोगों में शंख ध्वनि फायदा पहुंचाती है। रूक-रूक कर बोलने व हकलाने वाले यदि नित्य शंख-जल का पान करें, तो उन्हें आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा। दरअसल मूकता व हकलापन दूर करने के लिए शंख-जल एक महौषधि है।


शंखों में भी विशेष शंख जिसे दक्षिणावर्ती शंख कहते हैं इस शंख में दूध भरकर शालीग्राम का अभिषेक करें। फिर इस दूध को निरूसंतान महिला को पिलाएं। इससे उसे शीघ्र ही संतान का सुख मिलता है।


1928 में बर्लिन यूनिवर्सिटी ने शंख ध्वनि का अनुसंधान करके यह सिद्ध किया कि इसकी ध्वनि कीटाणुओं को नष्ट करने कि उत्तम औषधि है।


माना जाता है कि पूजा-पाठ में शंख बजाने से शरीर और आसपास का वातावरण शुद्घ होता है और सतोगुण की वृद्घि होती है, जो मनुष्य के विकास में सहायक होता है।


जहां तक शंख की आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं और वे पूजा-अर्चना के लिए प्रेरित होते हैं। ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से हमारी कामनाएं पूरी होती हैं।


चूंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में शंख को धारण करते हैं, लिहाजा शंख को बेहद शुभ माना जाता है। साथ ही ऐसी मान्यता है कि जिस घर में शंख होता है, वहां लक्ष्मी का वास होता है और दिनोंदिन उन्नति होती है।


शंख बजाने से फेफड़े का व्यायाम होता है और स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। खासतौर पर श्वास के रोगी के लिए यह बेहद असरदार माना गया है। आयुर्वेद के अनुसार शंख बजाने से दमा, यकृत और इन्फ़्लुएन्ज़ा जैसी बीमारियां भी दूर होती हैं।


पूजा के समय शंख में जल भरकर देवस्थान में रखने और उस जल से पूजन सामग्री धोने और घर के आस-पास छिड़कने से वातावरण शुद्ध रहता है। क्योकि शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भूत शक्ति होती है। साथ ही शंख में रखा पानी पीना स्वास्थ्य और हमारी हड्डियों, दांतों के लिए बहुत लाभदायक है। शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे महाऔषधि माना जाता है।


शंख में जल रखने और इसे छिड़कने से वातावरण शुद्ध होता है। शंख में कैल्श‍ियम और फॉस्फोरस के गुण मौजूद होते हैं। लिहाजा शंख में रखे पानी के सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं।


प्रयोग के लिए कुछ दिन के लिए शंख को घर में लाये और उपरोक्त नियम-अनुसार लाभ प्राप्त करे .


उपचार और प्रयोग -

स्वास्तिक का महत्व - Importance of swastik

स्वस्तिक शब्द सू + उपसर्ग अस् धातु से बना है- सु अर्थात अच्छा, श्रेष्ठ, मंगल एवं अस् अर्थात सत्ता-यानी कल्याण की सत्ता, मांगल्य का अस्तित्व-स्वस्तिक हमारे लिए सौभाग्य का प्रतीक है-



स्वस्तिक को हिन्दू धर्म ने ही नहीं  सभी धर्मों ने परम पवित्र माना है-

स्वस्तिक दो रेखाओं द्वारा बनता है और दोनों रेखाओं को बीच में समकोण स्थिति में विभाजित किया जाता है-दोनों रेखाओं के सिरों पर बायीं से दायीं ओर समकोण बनाती हुई रेखाएं इस तरह खींची जाती हैं कि वे आगे की रेखा को न छू सकें-स्वस्तिक को किसी भी स्थिति में रखा जाए तब भी उसकी रचना एक-सी ही रहेगी-स्वस्तिक के चारों सिरों पर खींची गयी रेखाएं किसी बिंदु को इसलिए स्पर्श नहीं करतीं-क्योंकि इन्हें ब्रहाण्ड के प्रतीक स्वरूप अन्तहीन दर्शाया गया है-

स्वस्तिक गणपति का भी प्रतीक है-स्वस्तिक को भगवान विष्णु व श्री का प्रतीक चिह्न् माना गया है-स्वस्तिक की चार भुजाएं भगवान विष्णु के चार हाथ हैं-इस धारणा के अनुसार भगवान विष्णु ही स्वस्तिक आकृति में चार भुजाओं से चारों दिशाओं का पालन करते हैं-

स्वस्तिक के मध्य में जो बिन्दु है, वह भगवान विष्णु का नाभिकमल यानी ब्रम्हा का स्थान है-स्वस्तिक धन की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उपासना के लिए भी बनाया जाता है-

स्वस्तिक की खड़ी रेखा स्वयंभू ज्योतिर्लिंग का संकेत देती है तथा आड़ी रेखा विश्व के विस्तार को बताती है-

हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार अभिमंत्रित स्वस्तिक रूप गणपति पूजन से घर में लक्ष्मी की कमी नहीं होती-

वैज्ञानिक आधार:-


स्वस्तिक चिह्न् का वैज्ञानिक आधार भी है- गणित में + चिह्न् माना गया है-विज्ञान के अनुसार पॉजिटिव तथा नेगेटिव दो अलग-अलग शक्ति प्रवाहों के मिलनबिन्दु को प्लस (+) कहा गया है जो कि नवीन शक्ति के प्रजनन का कारण है- प्लस को स्वस्तिक चिह्न् का अपभ्रंश माना जाता है, जो सम्पन्नता का प्रतीक है-किसी भी मांगलिक कार्य को करने से पूर्व हम स्वस्तिवाचन करते हैं अर्थात मरीचि, अरुन्धती सहित वसिष्ठ, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह तथा कृत आदि सप्त ऋषियों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं- इसी लिए ऋषियों ने स्वस्तिक का निर्माण किया था -मंगल कार्यो के प्रारम्भ में स्वस्तिक बनाने मात्र से कार्य संपन्न हो जाता है- हिन्दू धर्म यह मान्यता रही है-

स्वस्तिक और वास्तुशास्त्र:-


घर को बुरी नजर से बचाने व उसमें सुख-समृद्धि के वास के लिए मुख्य द्वार के दोनों तरफ स्वस्तिक चिह्न् बनाया जाता है- स्वस्तिक चक्र की गतिशीलता बाईं से दाईं ओर है- इसी सिद्धान्त पर घड़ी की दिशा निर्धारित की गयी है-पृथ्वी को गति प्रदान करने वाली ऊर्जा का प्रमुख स्रोत उत्तरायण से दक्षिणायण की ओर है-इसी प्रकार वास्तुशास्त्र में उत्तर दिशा का बड़ा महत्व है-इस ओर भवन अपेक्षाकृत अधिक खुला रखा जाता है जिससे उसमें चुम्बकीय ऊर्जा व दिव्य शक्तियों का संचार रहे-वास्तुदोष क्षय करने के लिए स्वस्तिक को बेहद लाभकारी माना गया है-मुख्य द्वार के ऊपर सिन्दूर से स्वस्तिक का चिह्न् बनाना चाहिए-यह चिह्न् नौ अंगुल लम्बा व नौ अंगुल चौड़ा हो- घर में जहां-जहां वास्तुदोष हो वहां यह चिह्न् बनाया जा सकता है-यह वास्तु का मूल चिह्न् है-

हिन्दू मान्यता के अनुसार स्वास्तिक :-


किसी भी शुभ कार्य को आरंभ करने से पहले हिन्दू धर्म में स्वास्तिक का चिन्ह बनाकर उसकी पूजा करने का महत्व है-मान्यता है कि ऐसा करने से कार्य सफल होता है-स्वास्तिक के चिन्ह को मंगल प्रतीक भी माना जाता है-स्वास्तिक शब्द को ‘सु’ और ‘अस्ति’ का मिश्रण योग माना जाता है। यहां ‘सु’ का अर्थ है शुभ और ‘अस्ति’ से तात्पर्य है होना अर्थात स्वास्तिक का मौलिक अर्थ है ‘शुभ हो’, ‘कल्याण हो’-

असल में स्वस्तिक का यह चिन्ह क्या दर्शाता है-हिन्दू धर्मं में मान्यता है कि यह रेखाएं चार दिशाओं - पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण की ओर इशारा करती हैं-लेकिन हिन्दू मान्यताओं के अनुसार यह रेखाएं चार वेदों - ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद का प्रतीक हैं- कुछ यह भी मानते हैं कि यह चार रेखाएं सृष्टि के रचनाकार भगवान ब्रह्मा के चार सिरों को दर्शाती हैं-

बौद्ध धर्म में स्वास्तिक को अच्छे भाग्य का प्रतीक माना गया है-यह भगवान बुद्ध के पग चिन्हों को दिखाता है, इसलिए इसे इतना पवित्र माना जाता है-यही नहीं, स्वास्तिक भगवान बुद्ध के हृदय, हथेली और पैरों में भी अंकित है-

हिन्दू धर्म से कहीं ज्यादा महत्व स्वास्तिक का जैन धर्म में है-जैन धर्म में यह सातवं जिन का प्रतीक है- जिसे सब तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के नाम से भी जानते हैं- श्वेताम्बर जैनी स्वास्तिक को अष्ट मंगल का मुख्य प्रतीक मानते हैं-

उपचार और प्रयोग-

अगले लेख में -

स्वास्तिक और प्रचीन तथ्य :-

Saturday, October 24, 2015

श्वेतार्क गणपति का महत्व -

सफ़ेद फूल वाला आक या मदार या आंकड़ा का पौधा एक ऐसा वनस्पति है जो कम देखने में आता है जबकि नीली आभा वाले फूलो वाका आक का पौधा सर्वत्र दीखता है -श्वेतार्क की जडो का तंत्र जगत में बहुत महत्व है -ऐसा मन जाता है की 25 वर्ष पुराने आक के पौधे की जडो में गणपति की आकृति स्वयमेव बन जाती है और जहा ऐसा पौधा होता है वहा सांप भी अक्सर होता है इसी सफ़ेद फूल वाले पौधे में निर्मित होता है श्वेतार्क गणपति-



शास्त्रों में श्वेतार्क के बारे में कहा गया है- "जहां कहीं भी यह पौधा अपने आप उग आता है, उसके आस-पास पुराना धन गड़ा होता है। जिस घर में श्वेतार्क की जड़ रहेगी, वहां से दरिद्रता स्वयं पलायन कर जाएगी। इस प्रकार मदार का यह पौधा मनुष्य के लिए देव कृपा, रक्षक एवं समृद्धिदाता है।

सफेद मदार की जड़ में गणेशजी का वास होता है, कभी-कभी इसकी जड़ गणशेजी की आकृति ले लेती है। इसलिए सफेद मदार की जड़ कहीं से भी प्राप्त करें और उसकी श्रीगणेश की प्रतिमा बनवा लें। उस पर लाल सिंदूर का लेप करके उसे लाल वस्त्र पर स्थापित करें। यदि जड़ गणेशाकार नहीं है, तो किसी कारीगर से आकृति बनवाई जा सकती है। शास्त्रों में मदार की जड़ की स्तुति इस मंत्र से करने का विघान है-

चतुर्भुज रक्ततनुंत्रिनेत्रं पाशाकुशौ मोदरक पात्र दन्तो।


करैर्दधयानं सरसीरूहस्थं गणाधिनाभंराशि चूùडमीडे।।




गणेशोपासना में साधक लाल वस्त्र, लाल आसान, लाल पुष्प, लाल चंदन, मूंगा अथवा रूद्राक्ष की माला का प्रयोग करें। नेवैद्य में गुड़ व मूंग के लड्डू अर्पित करें। "ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्" मंत्र का जप करें। श्रद्धा और भावना से की गई श्वेतार्क की पूजा का प्रभाव थोड़े बहुत समय बाद आप स्वयं प्रत्यक्ष रू प से अनुभव करने लगेंगे।


हमें जब ये जानकारी हुई और इसके बारे में अध्यन किया तो एक जिज्ञासा जाग उठी और सन 1991 की बात है जब हम कुछ दिनों के लिए इलहाबाद में स्थाई रूप से तीन साल रहे-  मुझे एक मित्र जो रसूलाबाद रहते थे उन्होंने हमें एक पच्चीस साल पुराना पेड़ उपलब्ध कराया था-  उससे हमने रवि पुष्य नक्षत्र के एक दिन पहले अभिमंत्रित किया और दुसरे दिन जाके लाये रवि पुष्य में उसकी जड़ में गणपति की प्रतिमा का निर्माण कराया और सभी विधि विधान से घर में स्थापित किया जो दो साल हमारे घर रही और सच माने तो इतनी सुख सम्पनता थी जिसे यहाँ नहीं लिख सकता लेकिन दुर्भाग्य से 1993 रसूलाबाद में गंगा के  एक प्रचंड बाढ़ से हमारे घर में पानी इतने वेग से समां गया कि हमारी काफी चीजो के साथ वो प्रतिमा भी बह गई-पर ये सच है जिसके भी घर में श्वेतार्क गणपति की इस प्रतिमा की स्थापना होगी सच माने उसके घर में धन-वैभव की कभी कमी नहीं होती और सुख-शान्ति का निवास होता है - मुझे आज तक इस बात का अफ़सोस है कि प्रतिस्ठापित प्रतिमा  जल विलय हो गई मुझे शायद उतने ही दिन उनकी आराधना का फल मिलना था -


श्वेतार्क  गणपति एक बहुत प्रभावी मूर्ति होती है जिसकी आराधना साधना से सर्व-मनोकामना सिद्धि-अर्थ लाभ,कर्ज मुक्ति,सुख-शान्ति प्राप्ति ,आकर्षण प्रयोग,वैवाहिक बाधाओं,उपरी बाधाओं का शमन ,वशीकरण ,शत्रु पर विजय प्राप्त होती है ,यद्यपि यह तांत्रिक पूजा है -यदि श्वेतार्क की स्वयमेव मूर्ति मिल जाए तो अति उत्तम है अन्यथा रवि-पुष्य योग में पूर्ण विधि-विधान से श्वेतार्क को आमंत्रित कर रविवार को घर लाकर -गणपति की मूर्ति बना विधिवत प्राण प्रतिष्ठा कर अथवा प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति किसी साधक से प्राप्त कर साधना/उपासना की जाए तो उपर्युक्त लाभ शीघ्र प्राप्त होते है -यह एक तीब्र प्रभावी प्रयोग है .श्वेतार्क गणपति साधना भिन्न प्रकार से भिन्न उद्देश्यों के लिए की जा सकती है ,इसमें मंत्र भी भिन्न प्रयोग किये जाते है-

सर्वमनोकामना की पूर्ति हेतु श्वेतार्क गणपति का पूजन बुधवार के दिन प्राराम्भ करे -पीले रंग के आसन पर पीली धोती पहनकर पूर्व दिशा की और मुह्कर बैठे -एक हजार मंत्र प्रतिदिन के हिसाब से 21 दिन में 21 हजार मंत्र जप मंत्र सिद्ध चैतन्य मूंगे की माला से करे -पूजन में लाल चन्दन ,कनेर के पुष्प ,केशर,गुड ,अगरबत्ती ,शुद्ध घृत के दीपक का प्रयोग करे-

मन्त्र -     "ऊँ वक्रतुण्डाय हुम्"

घर में विवाह कार्य ,सुख-शान्ति के लिए श्वेतार्क गणपति प्रयोग बुधवार को लाल वस्त्र ,लाल आसन का प्रयोग करके प्रारम्भ करे ,इक्यावन दिन में इक्यावन हजार जप मंत्र का करे ,मुह पूर्व हो ,माला मूगे की हो,साधना समाप्ति पर कुवारी कन्या को भोजन कराकर वस्त्रादि भेट करे।

आकर्षण प्रयोग हेतु रात्री के समय पश्चिम दिशा को,लाल वस्त्र- आसन के साथ हकीक माला से शनिवार के दिन से प्रारंभ कर पांच दिन में पांच हजार जप मंत्र का करे -पूजा में तेल का दीपक ,लाल फूल,गुड आदि का प्रयोग करे |उपरोक्त प्रयोग किसी के भी आकर्षण हेतु किया जा सकता है |

सर्व स्त्री आकर्षण हेतु श्वेतार्क गणपति प्रयोग ,पूर्व मुख ,पीले आसन पर पीला वस्त्र पहनकर किया जाता है ,पूजन में लाल चन्दन ,कनेर के पुष्प ,अगरबत्ती,शुद्ध घृत का दीपक ,प्रयोग होता है -मूगे की माला से इक्यावन दिन में इक्यावन हजार जप मंत्र का किया जाता है जिसे बुधवार से प्रारंभ किया जाता है |

स्थायी रूप से विदेश में प्रवास करके विवाह करने अथवा अविवाहित कन्या का प्रवासी भारतीय से विवाह करके विदेश में बसने हेतु अथवा विदेश जाने में आ रही रूकावटो को दूर करने हेतु श्वेतार्क गणपति का प्रयोग शुक्ल पक्ष के बुधवार से प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में प्रारम्भ करे -पूर्व दिशा की और लाल ऊनी कम्बल ,पीली धोती के प्रयोग के साथ मंत्र सिद्ध चैतन्य मूंगे की माला से 21 दिन में सवा लाख जप मंत्र का करे -पूजन में लाल कनेर पुष्प ,घी का दीपक ,अगरबत्ती ,केशर ,बेसन के लड्डू ,लाल वस्त्र ,लकड़ी की चौकी ,का प्रयोग करे -बाइसवे दिन हवंन कर पांच कुवारी कन्याओं को भोजन कराकर वस्त्र -दक्षिणा दे विदा करे ,मूगे की माला अपने गले में धारण करे |

कर्ज मुक्ति हेतु श्वेतार्क गणपति का प्रयोग बुधवार को लाल वस्त्रादि-वस्तुओ के साथ शुरू करे और २१ दिन में सवा लाख जप मंत्र का करे मूंगे अथवा रुद्राक्ष अथवा स्फटिक की मंत्र सिद्ध चैतन्य माला से |साधा के बाद माला अपने गले में धारण करे ,पूजन में लाल वस्तुओ का प्रयोग करे ,दीपक घी का जलाए |

श्वेतार्क गणपति की साधना में एक बात ध्यान देने की है की प्राण प्रतिष्ठा होने के बाद मूर्ति चैतन्य हो जाती है और उसे हर हाल में प्रतिदिन पूजा देनी होती है -साधना समाप्ति पर यदि रोज पूजा देते रहेगे तो चतुर्दिक विकास होता है -यदि पूजा न दे सके या कोई भी सदस्य घर का पूजा न कर सके तो मूर्ति का विसर्जन कर दे-

उपरोक्त प्रयोगों में मंत्र भिन्न -भिन्न प्रयोग होते है -जिन्हें न देने का कारण सिर्फ इनके दुरुपयोग से इनको बचाना है -यह प्रयोग तंत्र के अंतर्गत आते है -अतः सावधानी आवश्यक है इसलिए मन्त्र यहाँ नहीं लिखे गए है क्युकि तंत्र के मन्त्र अचूक होते है और आज वैमनस्य के कारण लोग अहित कर देते है सिर्फ जो पात्रता के योग्य होते है उनको दिया जाता है।

उपचार और प्रयोग-

Friday, October 23, 2015

शादी में अनावश्यक देरी - Unnecessary delay in marriage

माता-पिता अनावश्यक देरी से बेटी के विवाह के लिए परेशान हो जाते है एक सुयोग्य वर मिले -कन्या की उम्र निकली जा रही है कभी-कभी रिश्ते बनते-बनते टूट जाते है -तो आप पूरे श्रधा और विस्वाश से कुछ इन टोटको को अपनाए तो आपको बहुत ही कम समय में लाभ मिल सकता है -




कन्या को गुरूवार का ब्रत रखना चाहिए और पूरे दिन संयम से रह कर कोई भी पीली वस्तु कपडा,चने की दाल,हल्दी,गुड आदि में कोई वस्तु का दान अवस्य करे - वृहस्पतिवार ब्रत कथा पढ़े और केले के वृक्ष पे जल चढ़ाए -दिन में कदापि न सोये -शाम को एक समय गुड व चने का भोग लगाए और एक समय पीला भोजन करे -इस प्रकार इक्कीस गुरूवार का संकल्प ले के ब्रत करे-

रविवार को पीले कपडे में सात सुपाड़ी ,सात हल्दी की गाँठ ,सात गुड की ढेली,सात पीले फूल ,चने की दाल सत्तर ग्राम ,एक पीला कपडा 70 सेंटीमीटर ,सात पीले सिक्के और एक पन्द्रह का यंत्र ले कर माता पार्वती का पूजन करके इसे चालीस दिन घर में रक्खे -और माता पार्वती से विवाह शीघ्र होने की प्रार्थना करे -इन चालीस दिनों में ही विवाह के आसार बनने लगेगे -

सावन माह में शिवजी को रोजाना बेलपत्र चढ़ाए बेलपत्र संख्या 108 हो तो सबसे अच्छा और सार्थक परिणाम आता है -पूजन के पश्चात निर्माल्य का तिलक अवस्य लगाए तो शीघ्र और उत्तम विवाह के योग बनते है -

कन्या यदि सोमवार की रात्रि के 12 बजे के बाद कुछ भी ग्रहण नहीं करे यानी कि इस उपाय के लिये जल भी ग्रहण नहीं किया जाता. इस उपाय को करने के लिये अगले दिन मंगलवार को प्रात: सूर्योदय काल में एक सूखा नारियल लें-सूखे नारियल में चाकू की सहायता से एक इंच लम्बा छेद किया जाता है-अब इस छेद में 300 ग्राम बूरा (चीनी पाऊडर) तथा 11 रुपये का पंचमेवा मिलाकर नारियल को भर दिया जाता है- यह कार्य करने के बाद इस नारियल को पीपल के पेड के नीचे गड्डा करके दबा देना- इसके बाद गड्डे को मिट्टी से भर देना है तथा कोई पत्थर भी उसके ऊपर रख देना चाहिए-यह क्रिया लगातार 7 मंगलवार करने से व्यक्ति को लाभ प्राप्त होता है बस यह ध्यान रखना है कि सोमवार की रात 12 बजे के बाद कुछ भी ग्रहण नहीं करना है-

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Wednesday, October 21, 2015

नींद न आये या अधिक नींद आये तो क्या करे - If you do not get to sleep or sleep come more

जिनके घर में अनिष्ट शक्तियों का कष्ट होता है या घर में कोई वास्तु दोष होता है  उनके घर के सदस्यों को या तो नींद नहीं आती या अत्याधिक नींद आती है या दिन भर आलस बना रहता है तो आपको ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए यह जान लेते हैं - बिना किसी अतिरिक्त दवा के -




यदि नींद अधिक आती हो या नींद नहीं आती हो तो एक बात सुस्पष्ट है कि घर का वातावरण अशुद्ध है अतः घर में वास्तु शुद्धि के सारे उपाय नियमित करें -

सबसे पहले ये उपाय करे :-



सबसे पहले आप अपने घर में एक तुलसी के पौधे को लगायें तथा घर एवं आसपास के परिसर को स्वच्छ रखें |

रात को अपने घर में दो दिन नीमपत्ती की धुनी जलाएं या फिर घर में कंडे या लकड़ी से अग्नि प्रज्वलित कर धुना, लोबान एवं गूगुल जलाएं |

घर में नामजप करें या संतों के भजन-स्त्रोत्र -पठन या सात्त्विक नाम जप की ध्वनि रिकार्डर चलायें |

घर में नियमित गौ मूत्र का छिड़काव् करें ये आस पास के सभी निगेटिव वाइरस को खत्म करने की छमता रखता है- पुराने ज़माने में लोग जब मकान कच्चे हुआ करते थे तो गाय के गोबर से आँगन इत्यादि को लीपते थे उसका लाजिक भी यही था घर के आस पास निगेटिव वाइरस को समाप्त करना लेकिन गाय के मूत्र में आज भी वही गुण विधमान है ये एक प्राक्रतिक फिनायल है-

आप जैसे भी अपने घर कलह क्लेश टालें, वास्तु देवता "तथास्तु" कहते रहते हैं हैं अतः क्लेश से क्लेश और बढ़ता है और धन का नाश होता है जिस घर में क्लेश होता है वहां कभी सुख सम्पति नहीं आती है इसलिए कहावत है "जहाँ सुमति तहां सम्पति नाना ,जहाँ कुमति तहां विपति निधाना"

जब कभी भी -सत्संग प्रवचन का आयोजन करें - अतरिक्त स्थान घर में हो तो धर्मकार्य हेतु या साप्ताहिक सत्संग हेतु वह स्थान किसी संत या गुरु के कार्य हेतु अर्पण करें यदि ये भी न हो सके तो एक बार नवरात्रि में माता की आरती पाठ इत्यादि आयोजन करे जिस घर में कोई भी एक व्यक्ति हनुमान चलिषा या हनुमान अष्टक का पाठ कर लेता है उसके घर में कलह, विपति, बीमारी आदि कोसो दूर रहती है सिर्फ पांच मिनट का पाठ आपके जीवन को सुरक्षित और संपन्न करता है और निर्मल विचार की ओर उन्मुक्त करता है .जो व्यक्ति रात को सोते समय एक भी चलिषा के दोहे को मन ही मन सुमिरन करके विश्राम करता है उसे कभी बुरे स्वप्न नहीं आते है -.

संतों के चरण घर में पड़ने से घर की वास्तु 70% तक शुध्द हो जाती है अतः संतो के आगमन हेतु अपनी अपनी भक्ति बढ़ाएं मगर ढोगी साधू संतो से दूर रहे उत्तम संतो के अंदर लालच नहीं होता है वो अनायास ही किसी के घर में पदार्पण नहीं करते है न ही व्यापार में लिप्त होकर किसी वस्तु को भक्तो को बेचने हेतु प्रोत्साहित करते है-

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आप प्रसन्न एवं संतुष्ट रहें- घर के सदस्यों का प्रसन्नचित रहने से घर की 30% शुद्धि हो जाती है क्लेश को स्थान न दे आने वाले मेहमान का निस्वार्थ भाव से स्वागत करे ये सोच कर इसमें भी वही प्रभु विद्धमान है जो सब में है मगर उसकी नियत को भी पहचाने कही वो आपके अनिष्ट का प्रतिभागी तो नहीं -

रात में सोते समय हो सके तो दिन भर बिछे चादर पर न सोयें क्योंकि घर में अनिष्ट शक्तियों के कष्ट होने पर वे बिछावन पर पहले से ही कई फुट का सूक्ष्म काला आवरण निर्माण कर देते हैं और ऐसे में सोने के लिए प्रयास करते समय बुरे विचार आना, नींद न आना, नींद आने के पश्च्चात भयानक स्वप्न आना , अगले दिन उठते समय संपूर्ण शरीर में वेदना होना या उठने के लिए अत्यधिक प्रयास करने पर ही उठ पाना , उठने के पश्चात तरोताजा न अनुभव कर पाना और थकावट अनुभव करना जैसे कष्ट यदि होते हों तो समझ लें कि रात्रि में हम पर अनिष्ट शक्तियों के आक्रमण हुए हैं - इस हेतु क्या प्रयास कर सकते हैं इससे भी हम आपको अवगत कराते है- .

सोते समय स्वच्छ चादर और हो सके तो सफ़ेद चादर बिछा कर सोयें -सोने से पहले हाथ पैर स्वच्छ जल से धो लें और फिर सोने जाएँ-कमरे को पूर्ण अन्धकार कर न सोयें - लाल या नीला या हरे रंग के night बल्ब जला कर न सोयें इन रंगों के बल्ब अनिष्ट शक्तियों को आकृष्ट करते हैं - हलके पीले या सफ़ेद माध्यम प्रकाश देने वाले बल्ब जला कर सो सकते हैं -

यदि कष्ट तीव्र हो तो अपनी क्षमता अनुसार घी या तेल के दीप जलाकर सोयें और दीप से प्रार्थना करें कि उसके प्रकाश से पूर्ण रात्रि आपका अनिष्ट शक्तियों से रक्षण हो -

किसी संत के आश्रम से लाकर अगरबत्ती अपने बिछावन के थोडा दूर जलाकर सोयें -

पैर दक्षिण दिशा की ओर कदापि न हों इस इससे दक्षिण से आनेवाली राज-तम प्रधान लहरिओं को हमारी पैर की उँगलियाँ सोख लेती है जिससे कष्ट का प्रमाण बढ़ जाता है -

नग्न होकर कदापि न सोयें इससे भी अनिष्ट शक्तियों का कष्ट बढ़ जाता है-

सोने से पूर्व पूर्ण दिवस जो भी अच्छा या बुरा हमारे द्वारा हो उसका आत्म निवेदन अपने गुरु या इष्ट को अवश्य करें -और प्रार्थना करे कल का दिन आप मुझे मार्ग निर्देश दे  क्युकि जीवन में सच्चा गुरु अंतर द्रष्टि रह कर भी आपका पथ प्रदर्शक है -

किसी होटल में या अन्य किसी के घर पर सोना पड़े तो अपने ओढने और बिछाने वाला चादर अपने साथ अवश्य रखें अन्य किसी के बिछावन पर न सोयें चाहे वह कितना भी महंगा क्यों न हो - यह मुद्दा उन लोगों ने विशेषकर ध्यान में रखनी चाहए जो अधिकतर यात्रा पर रहते हैं, निर्धारित स्थल पर पहुँचते ही अपने इष्ट का या गुरु का फोटो होटल के कमरे में लगा दें इससे वहां के वास्तु की शुद्धि होने लगेगी और रात्रि होने तक वास्तु कुछ स्तर तक पवित्र हो जायेगा -

सबसे महत्व पूर्ण है कि सोने से पूर्व बिछावन पर बैठकर 15 मिनट अपने गुरुमंत्र का या इष्टदेवता का मंत्र जपकर सोयें और प्रार्थना इस प्रकार करें - हे भगवन, अभी 15 मिनट जो मैं जप करने जा रहा हूँ  उस जप से आज संपूर्ण रात्रि मेरे अनिष्ट शक्तियों से रक्षण हो और मैं सुबह निर्धारित समय पर उठ पाऊं ऐसी आप कृपा करें रात भर मेरे चारों आपके शस्त्रों से कवच निर्माण हो ऐसी आप कृपा करें - ध्यान में रखें कि लेटकर यह कवच हेतु जप न करने क्योंकि यह जप पूर्ण करने से पहले ही अनिष्ट शक्तियां हमें सुला देती हैं जिससे कि  उनका काम रात्रि में सरलता से होता रहे और वे हमें संपूर्ण रात्रि कष्ट देते रहे -

अपने बिछावन के चारों ओर सात्त्विक नामजप कि पट्टियाँ लगा सकते हैं या फिर रात्रि में सोने से पूर्व संत लिखित ग्रन्थ का वाचन कर सो सकते हैं या रात्रि में अपने लैपटॉप पर या cd प्लयेर पर नामजप की cd 'repeat ' लगाकर सो सकते हैं या किसी यज्ञ कि विभूति या मंदिर से प्राप्त विभूति को चुटकी भर लेकर अपने बिछवान के चारो ओर सोने से पूर्व फूँक सकते हैं -

जो लोग इंटर नेट का प्रयोग करते है देर रात तक... वो अपने जीवन में दो चीज खो रहे है पहला अपना स्वास्थ और पौरुष दूसरा मानसिक शांति... उपयोग करे पर देर रात नहीं या फिर सुबह जल्दी उठ कर भी आप सर्च कर सकते है उस वक्त मानसिक शान्ति जादा होती है मगर  युवा वर्ग नहीं समझता है और बाद में दवा लेता पाया जाता है बाद में दवा के साइड इफेक्ट की दवा ढूंढता रहता है -

किसी आश्रम द्वारा लाई गई विभूति का टीका लगा कर सो सकते हैं या फिर हनुमान जी के चरणों का सिंदूर का तिलक लगा के सोये तो आपको कभी भी बुरे स्वप्न नहीं आयेगे और नकारात्मक उर्जा भी घर से दूर होती जायेगी ये सिंदूर आप पहले से भी ला के रख सकते है रोज जाने की आवश्यकता नहीं होगी -

सोने से पूर्व नमक पानी का उपाय कर सकते हैं जल में नमक डाले और दोनों पैर पन्द्रह मिनट रक्खे फिर सो जाए- आपको अच्छी नींद आएगी और दिन भर की थकावट से भी आराम होगा -

जो लोग अपने कमरे में फ़िल्मी नायक या नायिकाओं के चित्र या अन्य तामसिक चित्र लगाते है उनको ये सलाह है उन चित्रों से मन विचलित होता है सोने के कमरे में येसा चित्र न लगाए अगर आप किसी देवी देवता का चित्र लगाते है तो विशेष ध्यान रक्खे कि सोते वक्त आपका पैर उनकी तरफ न पड़े आपकी दाई तरफ हो और सुबह नींद खुलने पे उनका दर्शन हो .


निंद्रा को कैसे यज्ञकर्म बनाए :-



आप निद्रा को भी एक यज्ञकर्म बना सकते हैं  यदि सोते समय नाम जप करते हुए सोते है तो उसकी मानसिक आवर्ती रात भर चलती रहती है और सुबह आपको प्रतीत होगा आपने सारी रात नाम जप किया है आपका ये प्रयोग आपको एक साथ दो चीजों का प्रतिफल देता है पहला ये आपको नींद अच्छी आएगी दूसरा आप जो मानसिक जप कर रहे थे आपको जीवन की सभी कठिनाइयो से दूर कर देगा -मेरे द्वारा दिया ज्ञान देखने में आपको भले ही सूक्ष्म लगे लेकिन सिर्फ दस दिन में ही आपको इसका प्रभाव स्वयं महसूस होगा -

इस प्रकार निद्रा का समय भी थोड़े समय में साधना हेतु उपयोग में आने लगेगा और जब सुबह उठाने पर सर्वप्रथम आपका ध्यान नामजप परजाए तो समझ लें कि संपूर्ण रात्रि आपका जप चल रहा था |

ये कुछ येसे प्रयोग थे जो हमने आपके साथ शेयर किये जो जीवन में हमने स्वयं प्रयोग किये और लाभ लिए है वैसे भी आज के युग में जीविकोपार्जन के बाद पत्नी और बच्चो की डिमांड के बाद किसी पे भी समय नहीं है कि वो कुछ कर सके मगर सोते समय एक छोटा सा प्रयास आपके जीवन में चार चाँद लगा सकता है मगर मित्र गन ध्यान दे "हथेली में सरसों न उगाए ,जो निराशा में जीते है उन्हें निराशा ही मिलती है "

उपचार और प्रयोग -