Sunday, December 6, 2015

पानी को चुम्बकांकित करने की विधि - The method of water Chumbkankit

एक काँच की बॉटल में पानी भरकर डाट लगाकर फिट करके उसकी एक ओर उत्तर ध्रुव एवं दूसरी ओर दक्षिण ध्रुव आये इस प्रकार से चुम्बक लगायें। ये चुम्बक लगभग 2000 से 3000 गोस की शक्तिवाले चाहिए। इन चुम्बकों का उत्तरी ध्रुव उत्तर दिशा की ओर एवं दक्षिण ध्रुव दक्षिण दिशा की ओर आये इस प्रकार से जमायें-


सामान्यतया 24 घंटों में चुम्बकांकित पानी तैयार होता है। फिर भी यदि जल्दी उपयोग में लेना हो तो 12 से 14 घण्टे तक का प्रभावित जल भी लिया जा सकता है।






इस पानी को न तो गरम करें और न ही फ़्रीज में रखें। यदि किसी संक्रामक रोग का उपद्रव चल रहा हो तब उबाले हुए पानी को लोह चुम्बकांकित करके उपयोग में लाया जाये तो रोग का सामना आसानी से किया जा सकता है-

यह पानी औषधीय गुणों से युक्त होता है। स्वस्थ व्यक्ति उसका उपयोग करके पाचन क्रिया को सुधार सकता है और थकान मिटा सकता है। यह पानी रक्तवाहिनियों में कोलेस्टरोल को जमा होने से रोकता है तथा जमी हुई कोलेस्टरोल को दूर करके हृदय की कार्यक्षमता बढ़ाता है- 

यह पानी मूत्र होकर मूत्राशय, मूत्रपिंड एवं पित्ताशय की तकलीफों में उपयोगी है- 

इस पानी के द्वारा पथरी पिघल जाती है-

स्त्रियों की मासिक धर्म की अनियमितताएँ दूर होती हैं एवं गर्भाशय की तकलीफों में भी राहत मिलती है-

बुखार, दर्द, दमा, सर्दी, खाँसी आदि में, बालकों के विकास में तथा जहर के असर को मिटाने के लिए भी यह पानी उपयोगी है-

चुम्बकांकित पानी की मात्रा (Amount of water Chumbkankit)


दिन में चार बार, लगभग आधा-आधा गिलास जितना लें। बुखार में ज्यादा बार लें। छोटे बच्चों को केवल पाव गिलास पानी दें-

इस पानी का उपयोग आँखें धोने, जख्म साफ करने तथा जलने पर भी किया जा सकता है-

उसके अतिरिक्त अलग-अलग अंगों की चिकित्सा के लिए अलग-अलग शक्तिवाले चुम्बक के बनाये गये साधन, पट्टे आदि मिलते हैं। उनके द्वारा भी दिन में दो-तीन बार चिकित्सा करने से शरीर के अंग क्रियाशील होकर स्वस्थ होने में मदद करते हैं-

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चुम्बक चिकित्सा अंग विशेष का उपचार और सामान्य उपचार दो प्रकार से की जाती है जाने प्रस्तुत लेख में कैसे होती है ये चिकित्सा -





अंग विशेष का उपचार(Organ-specific treatment)


उपचार की इस विधि में चुम्बक का ध्रुव रोगग्रस्त अंग पर लगाया जाता है। चुम्बक चमड़ी के साथ या कपड़े के ऊपर से लगा दिया जाता है और उस पर कोई दबाव नहीं डाला जाता। यदि यह तय हो कि रोग कीटाणुओं के कारण हैं तो उत्तरी ध्रुव लगाना चाहिए अन्यथा दक्षिणी ध्रुव। यदि रोगग्रस्त अंग पर हाथ लगाने से भी पीड़ा होती हो या सूजन अथवा घाव हो या कोई फोड़ा-फुंसी हो, तो चुम्बक उसके पास ही, जहां पर पीड़ा का अनुभव न होता हो, लगा दिया जाता है- 

यदि यह आवश्यक पाया जाए कि दोनों ध्रुवों का प्रयोग करना चाहिए तो दोनों ध्रुव थोड़े-थोड़े फासले पर रोगग्रस्त अंग पर रख दिए जाते हैं। दूसरा तरीका यह है कि चुम्बक का एक भाग रोगग्रस्त अंग पर और दूसरा उसी अंग की ओर की हथेली या तलवे से लगा दिया जाए-

सामान्य उपचार(Treatment General)


यह उपचार उस दशा में आवश्यक है जब रोग किसी एक अंग तक ही सीमित न हो बल्कि इतना फैल गया हो कि सारे शरीर या अधिकतर अंगों पर उसका प्रकोप हो। ऐसी दशा में चुम्बक के दोनों ध्रुव हथेलियों या तलवों के साथ लगा दिए जाते हैं। इस प्रयोजन के लिए दो चुम्बकों की आवश्यकता पड़ती है। कारण यह है कि हथेलियों और तलवों का मस्तिष्क और हृदय से संबंध होता है और स्नायुओं और रक्तवाहिनी नाड़ियों के माध्यम से शरीर के अन्य अंगों से भी-

वास्तव में तलवों और हथेलियों में स्नायु पुंज होते हैं और वहां तक पहुंचने वाली नाड़ियां सारे शरीर में फैली होती हैं। उनके माध्यम से चुम्बक का प्रभाव शरीर के कोने-कोने तक पहुंच जाता है। यही कारण है कि चुम्बक लगाने के लिए हथेलियां और तलवे शरीर के सबसे उपयुक्त अंग हैं-

प्रश्न यह है कि चुम्बक हथेलियों से कब लगाए जाएं और तलवों से कब..? और फिर यह भी देखना है कि किस हथेली या तलवे पर चुम्बक का कौन सा ध्रुव लगाना चाहिए। यदि रोग शरीर के ऊपरी भाग में हो तो चुम्बक हथेलियों के नीचे रख दिए जाते हैं और यदि निचले भाग में हो तो तलवों पर चुम्बक का प्रभाव डाला जाता है। यदि सारे शरीर में या उसके अधिकतर भागों में रोग व्याप्त हो तो चुम्बक एक दिन हथेलियों के नीचे रखे जाते हैं और अगले दिन तलवों के नीचे। यदि दिन में दो बार चुम्बक लगाना आवश्यक हो तो सवेरे हथेलियों के नीचे और शाम को तलवों के नीचे लगाने चाहिए। यदि रोग बहुत बढ़ गया हो तो चुम्बक पहले हथेलियों के नीचे लगाए जाएं और उसके बाद तलवों के नीचे- 

रोगों की चिकित्सा चुम्बक चिकित्सा शरीर की विभिन्न व्यवस्थाओं अर्थात रक्त-संचार, स्नायु-व्यवस्था, पाचन-क्रिया, श्वास-व्यवस्था और मल-मूत्र तथा प्रजनन-व्यवस्था को नियमित करके रोगों का उपचार करती है। जब ये सारी व्यवस्थाएं नियमित रूप से चल रही हों तो मनुष्य को कोई भी आंतरिक रोग नहीं होता और वह स्वस्थ रहता है। प्रत्येक रोग या विकार उपर्युक्त व्यवस्थाओं से संबंधित है और चूंकि चुम्बक-चिकित्सा इन विकारों को दूर कर सकती है, इसलिए वह लगभग सभी रोगों के इलाज में सफल होती है-

कमर का दर्द(Pain in the groin)


अक्सर लोग कमर के किसी न किसी भाग में दर्द होने की शिकायत करते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं, जैसे कि गलत ढंग से बैठना, अचानक कोई झटका लग जाना, या कठोर परिश्रम। आराम करने से या सेंकने से पीड़ा कम होती है लेकिन नीचे झुकने आदि से बढ़ जाती है। कमर में पीड़ा गठिया या वात के कारण हो सकती है, स्पोंडिलाइटिस के कारण या रीढ़ की हड्डी के किसी टुकड़े के अपने स्थान से हिल जाने के कारण-

चिकित्सा(Treatment)

यदि कमर के ऊपरी या निचले भाग में पीड़ा हो तो ऊपरी भाग में चुम्बक का उत्तरी ध्रुव और निचले भाग में दक्षिणी ध्रुव लगाना चाहिए। यदि दायीं या बायीं ओर पीड़ा हो तो दायीं ओर उत्तरी ध्रुव और बायीं तरफ दक्षिणी ध्रुव लगाना चाहिए। ऐसा पानी भी पिलाना चाहिए जो चुम्बक के दोनों ध्रुवों से तैयार किया गया हो। 

उच्च रक्त चाप निम्न रक्त चाप(High blood pressure low blood pressure)

सामान्य-तया 60-90 से लेकर 100-140 तक होता है। इससे अधिक बढ़ जाए तो उसे उच्च और कम हो तो उसे निम्न रक्त चाप कहते हैं। रक्त चाप बढ़ने का कारण चर्बी में वृद्धि, कठोर परिश्रम, अनिद्रा, मानसिक तनाव या मोटापा हो सकता है।

चिकित्सा(Treatment)


यदि रक्त चाप बढ़ा हुआ हो तो ऊंची शक्ति के चुम्बक पर दोनों हथेलियां पांच छः मिनट तक रखी जाएं या मध्यम शक्ति के चुम्बकों पर दस मिनट तक। अच्छा यही रहेगा कि यह इलाज सवेरे किया जाए।

यदि रक्त चाप कम हो तो यही इलाज ऊंची शक्ति के चुम्बकों की सहायता से पंद्रह बीस मिनट तक और मध्यम शक्ति के चुम्बकों से आधे घंटे तक किया जाए।

बढे़ हुए रक्त चाप के लिए चुम्बकों से बने बाजूबंद मिलते हैं जिन्हें दायीं कलाई पर बांधा जाता है। उसी बाजूबंद को बायीं कलाई पर बांधा जाए तो निम्न रक्त चाप में लाभ होता है। ये बाजूबंद एक या दो घंटे तक बंधे रहने चाहिए।

चुम्बक के दोनों धु्रवों से तैयार किया गया पानी पीने से भी रक्त चाप सामान्य हो जाता है।

पेट की पीड़ा(Abdominal pain)


कई बार पेट में वायु के कारण या अंतड़ियों की मांसपेशियों में ऐंठन के कारण घोर पीड़ा होने लगती है। दबाव डालने से, मल के निकास से या वायु के निकास से रोगी को आराम मिलता है।

चिकित्सा(Treatment)


रोगी को प्रातः और संध्या समय दस मिनट तक अपनी दोनों हथेलियां ऊंची शक्ति के चुम्बकों पर रखनी चाहिए। उसके बाद अर्ध-चंद्राकार, चीनी मिट्टी के बने चुम्बक दोनों नासिकाओं से लगाने चाहिए। रोगी को ठंडी चीजें खानी या पीनी नहीं चाहिए और हो सके तो नहाने से भी परहेज करना चाहिए। उसे चुम्बक के दक्षिणी ध्रुव से तैयार किया गया पानी भी पीना चाहिए।

आंखों की सूजन(Inflammation of the eye)


आंखों में कई बार सूजन हो जाती है और उनसे मवाद निकलता है। इसके कई कारण हो सकते हैं। आंखें लाल हो जाती हैं और सूजन के कारण पीड़ा भी होती है।

चिकित्सा(Treatment)


अर्ध-चंद्राकार, चीनी मिट्टी के बने चुम्बक दोनों आंखों से लगाने चाहिए, चाहे एक ही आंख में सूजन हो या एक में अधिक और दूसरी में कम। ये चुम्बक कई बार आठ से दस मिनट तक लगाने चाहिए। आंखों को चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से तैयार किए गए पानी से धोना चाहिए और वही पानी पीना भी चाहिए।

घट्टा(callosity)


कई बार तलवों या पैर के ऊपर घट्टे बन जात है जो कांटे के सामान चुभते हैं। उनमें बड़ी पीड़ा होती है और रोगी को चलने में कष्ट का अनुभव होता है।

चिकित्सा(Treatment)


ऊंची या मध्यम शक्ति के चुम्बक तलवों के नीचे दिन में दो बार लगाने चाहिए। चुम्बक के उत्तरी ध्रुव से तैयार किया गया पानी पीया भी जाए और उससे घट्टों को धोया भी जाए।

मधुमेह(Diabetes)


मधुमेह दो प्रकार का होता है। एक में मूत्र में शक्कर आती है और दूसरे में केवल बहुमूत्रता होती है। पहले प्रकार के मधुमेह में बार-बार मूत्र त्याग करने की इच्छा होती है, रोगी को प्यास लगती है और वह बहुत पानी पीता है और उसके मूत्र और लहू, दोनों में शक्कर की मात्रा बढ़ जाती है। दूसरे प्रकार के मधुमेह में मूत्र तो बहुत आता है लेकिन उसमें शक्कर नहीं होती। जब हम मधुमेह की बात करते हैं तो हमारा अभिप्राय मुख्य रूप से पहले प्रकार के मधुमेह से होता है। मधुमेह का कारण यह है कि पैन्क्रियाज नाम की ग्रंथि ठीक से काम नहीं करती। यह रोग कई मामलों में वंशानुगत होता है।

चिकित्सा(Treatment)


रोगी को सवेरे दस मिनट तक अपनी हथेलियां ऊंची शक्ति के चुम्बकों पर रखनी चाहिए.

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केवल पृथ्वी ही नहीं, बल्कि मानव शरीर और प्रत्येक कण एक चुम्बक है। यही कारण है कि सभी जीवों के स्वास्थ्य और उनकी जीवन-शक्ति का संबंध पृथ्वी के साथ है-



यदि हम नंगे पांव घास पर चलें तो थकावट और विषाद दूर हो जाते हैं और कुछ ही समय बाद हम भले-चंगे और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं। इसका कारण यह है कि पृथ्वी की चुम्बक शक्ति हमारे शरीर में प्रविष्ट हो जाती है-

चुम्बक के प्रभाव की प्रक्रिया हमारा शरीर छोटी-छोटी कोशिकाओं से मिलकर बना है जो अपने-आप में नन्हे-मुन्ने चुम्बक हैं। शरीर के सभी अंगों का निर्माण इन्हीं चुम्बकीय कोशिकाओं से हुआ है और प्रत्येक अंग अपना चुम्बकीय क्षेत्र स्वयं बनाता है-

विभिन्न अंगों के ये चुम्बकीय क्षेत्र सदा एक-जैसे नहीं रहते बल्कि उनमें लगातार परिवर्तन होता रहता है। यह उतार-चढ़ाव इस बात पर निर्भर करता है कि शरीर कितना सक्रिय है, उसे आराम मिलता है या नहीं, उस पर बाहरी प्रभाव कौन-कौन से पड़ते हैं और उसे भोजन से कितने पौष्टिक तत्व प्राप्त होते हैं- 

स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि अलग-अलग चुम्बकीय क्षेत्रों और विभिन्न अंगों के चुम्बकीय क्षेत्रों के बीच संतुलन बना रहे।

चुम्बक चिकित्सा संतुलन ही स्वास्थ्य का मूलाधार है:-


रोगों की रोकथाम के लिये आवश्यक है कि शरीर में जमें अनावश्यक तत्त्वों को बाहर निकाला जावे एवं शरीर के सभी अंग उपांगों को संतुलित रख शारीरिक क्रियाओं को नियंत्रित रखा जाये। जो अधिक सक्रिय हैं, उन्हें शान्त किया जावे तथा जो असक्रिय हैं, उन्हें सक्रिय किया जावे। चुम्बक का उपचार इन सभी कार्यो में प्रभावशाली होता है। शरीर में चुम्बकीय ऊर्जा का असंतुलन एवं कमी अनेक रोगों का मुख्य कारण होती है। यदि इस असंतुलन को दूर कर अन्य माध्यम से पुनः चुम्बकीय ऊर्जा उपलब्ध करा दी जावे तो रोग दूर हो सकते हैं। चुम्बकीय चिकित्सा का यहीं सिद्धान्त है।


पृथ्वी के चुम्बक का हमारे जीवन पर प्रभाव-


जब तक पृथ्वी के चुम्बक का हमारी चुम्बकीय ऊर्जा पर संतुलन और नियंत्रण रहता है तब तक हम प्रायः स्वस्थ रहते हैं। जितने-जितने हम प्रकृति के समीप खुले वातावरण में रहते हैं, हमारे स्वास्थ्य में निश्चित रूप से सुधार होता है। पृथ्वी और हमारे मध्य जितने अधिक लोह उपकरण होते हैं, उतना ही कम पृथ्वी के चुम्बक से हमारा सम्पर्क रहता है। 

इसी कारण खुले वातावरण में विचरण करने वाले, गाँवों में रहने वाले, कुएँ का पानी पीने वाले, पैदल चलने वाले, अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ रहते हैं। जितना-जितना पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से संपर्क बढ़ता है, उतनी-उतनी शरीर की सारी क्रियायें संतुलित एवं नियन्त्रित होती है, उतने-उतने हम रोग मुक्त होते जाते हैं।

चुम्बक का शरीर पर प्रभाव(Effects of magnets on the body)


चुम्बक का थोड़ा या ज्यादा प्रभाव प्रायः सभी पदार्थो पर पड़ता है। चुम्बक की विशेषता है कि वह किसी भी अवरोधक को पार कर अपना प्रभाव छोड़ने की क्षमता रखता है। जिस प्रकार बेटरी चार्ज करने के पश्चात् पुनः उपयोगी बन जाती है, उसी प्रकार शारीरिक चुम्बकीय प्रभाव को चुम्बकों द्वारा संतुलित एवं नियन्त्रित किया जा सकता है-

चुम्बक का प्रभाव हड्डी जैसे कठोरतम भाग को पार कर सकता है, अतः हड्डी सम्बन्धी दर्द निवारण में चुम्बकीय चिकित्सा रामबाण के तुल्य सिद्ध होती है। चुम्बक चिकित्सा शरीर से पीड़ा दूर करने में बहुत प्रभावशाली होती है। चुम्बक घावों को शीघ्र भरता है। रक्त संचार ठीक करता है एवं हड्डियों को जोड़ने में मदद करता है-

रोग ग्रस्त अंग पर आवश्यकतानुसार चुम्बक का स्पर्श करने से, चुम्बकीय ऊर्जा उस क्षेत्र में संतुलित की जा सकती है। स्थायी रोगों, दर्द आदि में इससे काफी राहत मिलती हैं। चुम्बकीय उपचार करते समय इस बात का ध्यान रहे कि, रोगी को सिर में भारीपन न लगें, चक्कर आदि न आवें। ऐसी स्थिति में तुरन्त चुम्बक हटाकर धरती पर नंगे पैर घूमना चाहिये अथवा एल्यूमिनियम या जस्ते पर खड़े रहने अथवा स्पर्श करने से शरीर में चुम्बक चिकित्सा द्वारा किया गया अतिरिक्त चुम्बकीय प्रभाव कम हो जाता है।

चुम्बक का सिद्धान्त(Theories of magnets)


छड़ी वाले चुम्बक को धागे से बांध सीधा लटकाने पर जो किनारा भौगोलिक उत्तर की तरफ स्थिर होता है, यानि जो पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की तरफ आकर्षित होता है, चुम्बकीय चिकित्सा में उस ध्रुव को दक्षिणी ध्रुव कहते हैं। दूसरा किनारा उससे विपरीत यानी उत्तरी ध्रुव (True North Pole) होता है। दो चुम्बकों के विपरीत ध्रुवों में आकर्षण होता है तथा समान ध्रुव एक दूसरे को दूर फेंकते हैं। दक्षिणी ध्रुव का प्रभाव गर्मी बढ़ाना, फैलाना, उत्तेजित करना, सक्रियता बढ़ाना होता है, जबकि उत्तरी ध्रुव का प्रभाव इसके विपरीत शरीर में गर्मी कम करना, अंग सिकोड़ना, शांत करना, सक्रियता को नियन्त्रित एवं सन्तुलित करना आदि होता है।

चुम्बकीय उपचार की विधियाँ(Magnetic methods of treatment)


हमारे शरीर के चारों तरफ चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र होता है। जिसे आभा मण्डल भी कहते हैं। प्रायः दाहिने हाथ से हम अधिक कार्य करते हैं। अतः दाहिने भाग में दक्षिणी ध्रुव के गुण वाली ऊर्जा तथा बांयें भाग में उत्तरी ध्रुव के गुण वाली ऊर्जा का प्रायः अधिक प्रभाव होता है। अतः चुम्बकीय ऊर्जा के संतुलन होने हेतु बायीं हथेली पर दक्षिणी ध्रुव एवं दाहिनी हथेली पर चुम्बक के उत्तरी ध्रुव का स्पर्श करने से बहुत लाभ होता है। शरीर के चुम्बक का, उपचार वाले उपकरण चुम्बक से आकर्षण होने लगता है और शरीर में चुम्बकीय ऊर्जा का संतुलन होने लगता है। परन्तु यह सिद्धान्त सदैव सभी परिस्थितियों में विशेषकर रोगावस्था में लागू हो, आवश्यक नहीं..?

अतः स्थानीय रोगों में चुम्बकीय गुणों की आवश्यकतानुसार चुम्बकों का स्पर्श भी करना पड़ सकता है। फिर भी चुम्बकीय उपचार की निम्न तीन मुख्य विधियाँ मुख्य होती है-

रोगग्रस्त अंग पर आवश्यकतानुसार चुम्बक का स्पर्श करने से, चुम्बकीय ऊर्जा उस क्षेत्र में संतुलित की जा सकती है। स्थायी रोगों, दर्द आदि में इससे काफी राहत मिलती हैं-

एक्युप्रेशर की रिफलेक्सोलोजी के सिद्धान्तानुसार शरीर की सभी नाडि़यों के अंतिम सिरे दोनों हथेली एवं दोनों पगथली के आसपास होते हैं। इन क्षेत्रों को चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र में रखने से वहां पर जमें विजातीय पदार्थ दूर हो जाते हैं तथा रक्त एवं प्राण ऊर्जा का शरीर में प्रवाह संतुलित होने लगता है, जिससे रोग दूर हो जाते हैं। इस विधि के अनुसार दोनों हथेली एवं दोनों पगथली के नीचे कुछ समय के लिये चुम्बक को स्पर्श कराया जाता है। दाहिनी हथेली एवं पगथली के नीचे सक्रियता को संतुलित करने वाला उत्तरी ध्रुव तथा बांयी पगथली एवं हथेली के नीचे शरीर में सक्रियता बढ़ाने वाला दक्षिणी ध्रुव लगाना चाहिये-

चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र में किसी पदार्थ अथवा द्रव्य, तरल पदार्थों को रखने से उसमें चुम्बकीय गुण प्रकट होने लगते हैं जैसे- जल, दूध, तेल आदि तरल पदार्थो में चुम्बकीय ऊर्जा का प्रभाव बढ़ाकर उपयोग करने से काफी लाभ पहुंचता है। 

चुम्बकीय जल का उपयोग(Magnetized water use)

चुम्बक के प्रभाव को पानी, दूध, तेल एवं अन्य द्रवों में डाला जा सकता है। शक्तिशाली चुम्बकों पर ऐसे द्रव रखने से थोड़े समय में ही उनमें चुम्बकीय गुण आने लगते हैं। जितनी देर उसको चुम्बकीय प्रभाव में रखा जाता है, चुम्बक हटाने के पश्चात् लगभग उतने लम्बे समय तक उसमें चुम्बकीय प्रभाव रहता है। प्रारम्भ के 10-15 मिनटों में 60 से 70 प्रतिशत चुम्बकीय प्रभाव आ जाता है। परन्तु पूर्ण प्रभावित करने के लिये द्रवों को कम से कम शक्तिशाली चुम्बकों के 6 से 8 घंटे तक प्रभाव में रखना पड़ता है। चुम्बक को हटाने के पश्चात् धीरे-धीरे द्रव में चुम्बकीय प्रभाव क्षीण होता जाता है।

चुम्बकीय जल बनाने के लिये पानी को स्वच्छ कांच की गिलास अथवा बोतलों में भर, लकड़ी के पट्टे पर शक्तिशाली चुम्बकों के ऊपर रख दिया जाता है। 8 से 10 घंटे चुम्बकीय क्षेत्र में रहने से उस पानी में चुम्बकीय गुण आ जाते हैं। उत्तरी ध्रुव के सम्पर्क वाला उत्तरी ध्रुव का पानी तथा दक्षिणी ध्रुव के सम्पर्क वाला दक्षिणी ध्रुव के गुणों वाला पानी बन जाता है। दोनों के संपर्क में रखने से जो पानी बनता है उसमें दोनों ध्रुवों के गुण आ जाते है। तांबे के बर्तन में S Pole (दक्षिणी ध्रुव) तथा चांदी के बर्तन में N Pole (उत्तरी ध्रुव ) द्वारा ऊर्जा प्राप्त पानी अधिक प्रभावशाली एवं गुणकारी होता है-

चुम्बकीय जल की मात्रा का सेवन रोग एवं रोगी की स्थिति के अनुसार किया जाता है। स्वस्थ व्यक्ति भी यदि चुम्बकीय जल का नियमित सेवन करें तो, शरीर की रोग निरोधक क्षमता बढ़ जाती है। रोग की अवस्थानुसार चुम्बकीय जल का प्रयोग प्रतिदिन 2-3 बार किया जा सकता है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि चुम्बकीय प्रभाव से पानी दवाई बन जाता है-

उसको सादे पानी की तरह आवश्यकता से अधिक मात्रा में में नहीं पीना चाहिये। चुम्बक के अन्य उपचारों के साथ आवश्यकतानुसार चुम्बकीय पानी पीने से उपचार की प्रभावशालीता बढ़ जाती है। अतः चुम्बकीय उपचार से आधा घंटे पूर्व शरीर की आवश्यकतानुसार चुम्बकीय पानी अवश्य पीना चाहिये। चुम्बकीय जल की भांति यदि दूध को भी चंद मिनट तक चुम्बकीय प्रभाव वाले क्षेत्र में रखा जाये तो, वह शक्तिवर्द्धक बन जाता है।

पानी को चुम्बकांकित करने की विधि - The method of water Chumbkankit

इसी प्रकार किसी भी तेल को 45 से 60 दिन तक उच्च क्षमता वाले चुम्बक के चुम्बकीय क्षेत्र में लगातार रखने से उसकी ताकत बढ़ जाती है। ऐसा तेल बालों में इस्तेमाल करने से बालों सम्बन्धी रोग जैसे गंजापन, समय से पूर्व सफेद होना ठीक होते हैं-

चुम्बकीय तेल की मालिश भी साधारण तेल से ज्यादा प्रभावकारी होती है। जितने लम्बे समय तक तेल को चुम्बकीय प्रभाव क्षेत्र में रखा जाता है, उतनी लम्बी अवधि तक उसमें चुम्बकीय गुण रहते हैं। थोड़े-थोड़े समय पश्चात् पुनः थोड़े समय के लिये चुम्बकीय क्षेत्र में ऐसा तेल रखने से उसकी शक्ति पुनः बढ़ायी जा सकती है। जोड़ों के दर्द में ऐसे तेल की मालिश अत्यधिक लाभप्रद होती है-

दक्षिणी ध्रुव से प्रभावित दूध विकसित होते हुए बच्चों के लिये बहुत लाभप्रद होता है। दोनों ध्रुवों से प्रभावित दूध शक्तिवर्धक होता है-

दोनों ध्रुवों से प्रभावित तेल बालों की सभी विसंगतियां दूर करता है। सिर पर लगाने अथवा मानसिक रोगों के लिये चुम्बकीय ऊर्जा से ऊर्जित नारियल का तेल तथा जोड़ों के दर्द हेतु सूर्यमुखी, सरसों अथवा तिल्ली का चुम्बकीय तेल अधिक गुणकारी होता है-

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उपचार और प्रयोग-

Saturday, December 5, 2015

महिलाओं के लिए चूडियों का महत्त्व - The importance of bangles for ladies

आजकल अधिकांश महिलाएं चूड़ियां नहीं पहनती हैं चूड़ियों को पहनने के पीछे सुहाग की निशानी के अलावा भी कई अन्य महत्वपूर्ण कारण हैं-


आज जो महिलाए चूड़ियाँ नहीं पहनती है उन महिलाओं को कमजोरी और शारीरिक शक्ति का अभाव महसूस होता है। जल्दी थकान हो जाती है और कम उम्र में ही गंभीर बीमारियां घेर लेती हैं। जबकि, पुराने समय में महिलाओं के साथ ऐसी समस्याएं नहीं होती थीं-

उनका खानपान और नियम-संयम भी उनके स्वास्थ्य को अच्छा बनाए रखता था। चूड़ियों के कारण स्त्रियों को ऐसी कई समस्याओं से मुक्ति मिल जाती है-

शारीरिक रूप से महिलाएं पुरुषों की तुलना में अधिक नाजुक होती हैं।चूड़ियां पहनने से स्त्रियों को शारीरिक रूप से शक्ति प्राप्त होती है। पुराने समय में स्त्रियां सोने या चांदी की चूड़ियां ही पहनती थी। सोना और चांदी लगातार शरीर के संपर्क में रहता है, जिससे इन धातुओं के गुण शरीर को मिलते रहते हैं-

महिलाओं को शक्ति प्रदान करने में सोने-चांदी के आभूषण भी मुख्य भूमिका अदा करते हैं। हाथों की हड्डियों को मजबूत बनाने में सोने-चांदी की चूड़ियां श्रेष्ठ काम करती हैं-

आयुर्वेद के अनुसार भी सोने-चांदी की भस्म शरीर को बल प्रदान करती है। सोने-चांदी के घर्षण से शरीर को इनके शक्तिशाली तत्व प्राप्त होते हैं, जिससे महिलाओं को स्वास्थ्य लाभ मिलता है। इस कारण अधिक उम्र तक वे स्वस्थ रह सकती हैं-

चूड़ियों के संबंध में धार्मिक मान्यता यह है कि जो विवाहित महिलाएं चूड़ियां पहनती हैं, उनके पति की उम्र लंबी होती है। आमतौर पर ये बात सभी लोग जानते हैं। इसी वजह से चूड़ियां विवाहित स्त्रियों के लिए अनिवार्य की गई है। किसी भी स्त्री का श्रृंगार चूड़ियों के बिना पूर्ण नहीं हो सकता। चूड़ियां स्त्रियों के 16 श्रृंगारों में से एक है-

जिस घर में चूड़ियों की आवाज आती रहती हैं, वहां के वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा नहीं रहती है। चूड़ियों की आवाज भी सकारात्मक वातावरण निर्मित करती है। जिस प्रकार मंदिर की घंटी की आवाज वातावरण को सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करती है, ठीक उसी प्रकार चूड़ियों की मधुर ध्वनि भी वही कार्य करती है-

जिस घर में महिलाओं की चूड़ियों की आवाज आती रहती है, वहां देवी-देवताओं की भी विशेष कृपा बनी रहती है। ऐसे घरों में बरकत रहती है और वहां सुख-समृद्धि का वास होता है। साथ ही, यह बात भी ध्यान रखने योग्य है कि स्त्री को अपना आचरण भी पूर्णतया धार्मिक रखना चाहिए। केवल चूड़ियां पहनने से ही सकारात्मक फल प्राप्त नहीं हो पाते हैं-

मनीप्लांट पौधे लगाने के फायदे और नुकसान - Advantages and disadvantages Money plant plantation

घरों का सुंदरता बढ़ाने के लिये मनी प्लांट्स लगाए जाते हैं ये शुक्र के कारक हैं मनी प्लांट लगाने से पति-पत्नी के संबंध मधुर होते हैं लेकिन आप इसके फायदे और नुकसान दोनों पे अवश्य विचार करे-



लोगो की मान्यता है कि मनी प्लांट का पौधा घर में लगाने से घर में धन का आगमन बढ़ता है और सुख-समृद्धि में इजाफा होता है। इसी मान्यता के कारण बहुत से लोग अपने घरों में मनी प्लांट का पौधा लगाते हैं लेकिन मनी प्लांट को लगाने के बाद भी धनागमन में कोई अंतर नहीं होता है बल्कि कई बार आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है-

पौधे भी घर के हर हिस्से तथा हर वस्तु उसमें रहने वाले लोगों के जीवन को किसी न किसी तरह से प्रभावित करते  है। यहां तक कि घर में रखे फूल व पौधे भी परिवार के सदस्यों पर अपना असर डालते हैं-

वास्तु विज्ञान के अनुसार हर पौधे के लिए एक दिशा निर्धारित है। अगर उचित दिशा में पेड़-पौधा लगाते हैं तो वातावरण की सकारात्मक उर्जा का लाभ मिलता है। लेकिन गलत दिशा में वृक्षारोपण करने से लाभ की बजाय नुकसान होने लगता है-

वास्तु विज्ञान में मनी प्लांट का पौधा लगाने के लिए आग्नेय दिशा यानी दक्षिण-पूर्व को उत्तम माना गया है। आग्नेय दिशा के देवता गणेश जी हैं और प्रतिनिधि ग्रह शुक्र है। गणेश जी अमंगल का नाश करते हैं और शुक्र सुख-समृद्धि का कारक होता है। बेल और लता का कारक शुक्र होता है इसलिए आग्नेय दिशा में मनी प्लांट लगाने इस दिशा सकारात्मक प्रभाव प्राप्त होता है-

मनी प्लांट के लिए सबसे नकारात्मक दिशा ईशान यानी उत्तर पूर्व को माना गया है। इस दिशा में मनी प्लांट लगाने पर धन वृद्धि की बजाय आर्थिक नुकसान हो सकता है। ईशान का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति है। शुक्र और बृहस्पति में शत्रुवत संबंध होता है क्योंकि एक राक्षस के गुरू हैं तो दूसरे देवताओं के गुरू। शुक्र से संबंधित चीज इस दिशा में होने पर हानि होती है-

वास्तु विज्ञान के अनुसार उत्तर पूर्व दिशा के लिए सबसे उत्तम तुलसी का पौधा होता है। इसलिए ईशान दिशा में मनी प्लांट लगाने की बजाय चाहें तो तुलसी लगा सकते हैं। अन्य दिशाओं में मनी प्लांट का पौधा लगाने पर इसका प्रभाव कम हो जाता है-

परिवार में यदि कोई बीमार हो तो उसके आस-पास ताजा फूल रखना शुभ है किंतु रात को वहां से हटा देना चाहिए-फँगशुई के अनुसार बांस के पौधे सुख व समृद्धि के प्रतीक होते हैं-

गुलाब, चंपा व चमेली के पौधे मानसिक तनाव व अवसाद में कमी लाते हैं। इन्हें लगाना अच्छा होता है।

शयन कक्ष के नैऋत्य कोण में टेराकोटा या चीनी मिट्टी के फूलदानों में सूरजमुखी का पौधा मन में उल्लास पैदा करता है-


Friday, December 4, 2015

कोलेस्ट्रोल का घरेलू उपचार - Home remedies Cholesterol

भगवान् न करे आपको कभी कोलेस्ट्रोल  या बी पी की शिकायत  हो या फिर हार्ट अटेक आये। लेकिन अगर आपको कोई तकलीफ हुई तो डॉक्टर कहेगा एंजियोप्लास्टी करवाओ। इस ऑपरेशन मे डॉक्टर दिल की नाली में एक स्प्रिंग डालते है जिसे स्टेंट कहते हैं-





अब जाने कि यह स्टेंट  अमेरिका में बनता हे और इसकी कीमत  सिर्फ 3 डॉलर (Rs150-180) हे। इसी स्टेंट  को भारत मे लाकर 3-5 लाख रूपए मे बेचा जाता हे व आपको लूटा जाता है। डॉक्टर को लाखों रूपए का कमीशन मिलता हे इसलिए व आपसे बार बार कहता हे कि एंजियो प्लास्टी  करवाओ-

आप एक बात जान लीजिये कि एंजियो प्लास्टी  ऑपरेशन कभी किसी का सफल नहीं होता क्यूँकी डॉक्टर जो स्प्रिंग दिल की नाली मे डालता हे वह बिलकुल पेन  की स्प्रिंग तरह होता हें। कुछ ही महीनो में उस स्प्रिंग की दोनों साइड आगे व पीछे ब्लोकेज  (कोलेस्ट्रोल व फेट ) जमा होना शुरू हो जाता हे और फिर आता हे आपको दूसरा हार्ट अटैक फिर डॉक्टर कहता हें फिर से एंजियो प्लास्टी करवाओ-आपके लाखो रूपए लुटता हे और आपकी जिंदगी इसी में निकल जाती हैं-

क्या आप जानते है कि अमेरिका की कई बड़ी बड़ी कंपनिया भारत मैं दिल के रोगियों को अरबो की दवाई बेंच रही है-

कोलेस्ट्रोल ,बी पी व हार्ट अटेक का एक बहुत ही साधारण आयुर्वेदिक इलाज उप्लब्ध हे जिससे लाखो लोगो की बीमारिया दूर हो रही हें-


आयुर्वेदिक इलाज (Ayurvedic treatment)


अदरक (ginger juice) 


यह आपके खून को पतला करता हे वह दर्द को प्राकर्तिक तरीके से 90% तक कम करता हें।

लहसुन (garlic juice) 


इसमें मौजूद allicin तत्व कोलेस्ट्रोल  व BP को कम करता है वह हार्ट ब्लॉकेज को खोलता हे।

नींबू (lemon juice) 


इसमें मौजूद antioxidants, vitamin C वह potassium खून को साफ़ करते हैं व रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity) बढ़ाते हैं।

एप्पल साइडर सिरका ( apple cider vinegar) 


इसमें 90 प्रकार के तत्व हैं जो शरीर की सारी नसों को खोलते है, पेट साफ़ करते हे वह थकान को मिटते हें।आयुर्वेदिक प्रकिया के अनुसार इस मिश्रण को उबालकर एक तिहाई किया जाता है जिसके बाद इसमें शहद मिलाया जाता हें। शहद में 5000 enzymes व 23 प्रकार के minerals होते हैं जो शरीर को लचीला बनाते हे।लेकिन इस दवाई को घर पर बनाना बहुत मुश्किल हें।

कभी घर पर लहसुन का जूस निकालकर देखिये। पर राजस्थान के udaipur जिले के एक सज्जन कई सालों से इसे बना रहे हैं वह हज़ारों लोगो का इलाज कर रहे हें। इसी मिश्रण से कई रोगियों के asthma, allergy, BP, cholestrol, heart blockage, जोडो का दर्द, arthritis, सर्दी खासी, acidity व gas का प्राकर्तिक तरीके से इलाज हुआ व कई मरीजो ने 2 महीनो मे ही 4-5 kilo वजन कम किया। इस दवाई से कुछ महीने में ही आपकी सारी नसे खुल जाएगी।

ये याद रखे की आजकल की दिनचर्या के अनुसार 30-35 की उम्र के बाद सभी को ब्लॉकेज होना शुरू हो जाता हे। पर लोगो को खुद अपने ब्लोकेज की जानकारी न होने कारण हार्ट अटेक की नौबत आती हैं।

इस दवाई के बारे में अधिक जानकरी इसकी website www.herbaldaily.in पर ले सकते हे व इसे बनाने वाले सज्जन से 08764021693 पर बात भी कर सकते हे। इसे लेने से आपको कभी ऑपरेशन की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। घर में ही हमारे भारत के आयुर्वेद से इसका इलाज हो जाएगा-

उपचार और प्रयोग -

कब्ज का इलाज - Treatment Constipation

भारत में मशीन का पिसा आटा प्रयोग में आने लगा और नाश्ते में लोग ब्रैड आदि का सेवन करने लगे तब से पाचन संबंधी समस्याएं पेट में पैदा होने लगी है सभी रोगों की जड़ पेट में मल के कुपित होने से पैदा होती है पेट में कब्ज का बने रहना अनेकानेक रोगों को जन्म देता है पेट का कब्ज अनेक प्रकार की बीमारियों को जन्म देता है इसलिए रोगों से दूर रहना है तो कब्ज को दूर भगाए -


                                    "सर्वेषामेव रोगाणां निदानं कुपिता मला:"

प्रयोग-

                                 "हर्र बहेड़ा, आंवला भाग एक दो चार।
                    तीनों औषधि लीजिये, त्रिफला कहे विचार।"

एक भाग हर्र , दो भाग बड़ी बहेड़ा और चार भाग आंवला तीनों को मिला कर पीस लें। इस योग को त्रिफला कहा जाता है। नित्य रात्रि में गर्म पानी से एक चम्मच त्रिफला चूर्ण का सेवन करने से पेटनिरोगी रहता है। कब्ज को दूर करता है-

                               सनाय सौंफ मुनक्का, दस दस ग्राम मिलाय।
                     गोंद बबूल संग पीसकर लीजे चूर्ण बनाय।
                     प्रतिदिन रात्रि के समय दूध साथ पी जाय।
                     कब्ज पुराना दूर हो उदर विकार मिटाय।

सनाय, सौंफ और मुनक्का दस दस ग्राम लेकर उसमें बबूल का गोंद मिला कर पीसे लें। इस प्रकार तैयार चूर्ण को यदि रात के समय दूध के साथ सेवन किया जाए तो पुराने से पुराना पेट का कब्ज दूर हो जाता है-

1- प्रातः उठते ही कुल्ला करके या दन्त मंजन करके एक गिलास ठण्डा पानी पी कर इसके बाद एक गिलास कुनकुने गर्म पानी मेँ नीबू निचोङ कर पी लेँ, फिर शौच के लिए जाएं। शौच आने मेँ देर लगे तो जोर न लगाएं बल्कि खङे होकर पैरोँ को दो फीट के फासले से फैला कर झुक जाएं और हथेलियां घुटनोँ पर रख कर सांस जोर से बाहर फेँक देँ। अब बाहर सांस रोक हुए रख कर पेट को अन्दर खीँचे छोङे। ऐसा जितनी बार कर सकेँ उतनी बार, सांस को बाहर रोके हुए रख कर करेँ फिर सांस अन्दर खीँच कर खङे हो जाएं। 3-4 बार सांस लेकर फिर झुक जाएं और सांस बाहर फेंक कर पेट को बाहर भीतर चलाएं। ऐसा 3-4 बार करके वापिस शौच के लिए बैठ जाएं। इस क्रिया से मल जल्दी विसर्जित हो जाता है। इसे अग्निसार क्रिया कहते है-

2- शाम के वक्त शौच अवश्य जाना चाहिए। यदि अभी तक न जाते होँ तो आज ही से जाने लगेँ। एक निश्चित समय पर शौच के लिए जाएं और थोङी देर बैठ कर आ जाएं। शौच न आये तो जोर न लगाएं। वहीँ घुटनोँ पर हाथ रख कर पेट को बाहर भीतर चलाने की क्रिया 10-20 बार करेँ। धीरे धीरे आदत बन जायेगी और शौच होने लगेगा। शाम को शौच न जाना खुद कब्ज पैदा करना ही है। इतने उपाय करने से कुछ ही दिनोँ मेँ कब्ज से पिण्ड छूट जाएगा-

3- सोते समय ठण्डे पानी या दूध के साथ सत इसब गोले 1-2 चम्मच मात्रा मेँ प्रतिदिन सेवन करना चाहिए। इससे सुबह शौच खुल कर होता है और पेट हलका हो जाता है।

4- दुध मेँ एक या दो छोटी हरङ को कुट कर उबाल कर पीने से कब्ज से छुटकारा मिलता है। यह उपाय मेरा खुद का आजमाया हुआ है और असरकारक है।

5- अजवायन, वायविडंग, निशोथ, सौँफ, काला नमक, छोटी हरण सब 10-10 ग्राम। काला दाना 50 ग्राम और सनाय 35 ग्राम। सबको पीस कर मिला लेँ और शीशी मेँ भर एयर टाइट ढक्कन लगा कर रखेँ। रात को सोते समय 1 चम्मच चूर्ण कुनकुने गर्म पानी के साथ सेवन करेँ। इससे सुबह दस्त साफ होता है। चूर्ण की मात्रा अपने कोठे की स्थिति के अनुसार कम ज्यादा कर लेँ। यह नुस्खा कब्जीना चूर्ण के नाम से बना बनाया बाजार मेँ मिलता है।

पंच सकार चूर्ण - 


यह हल्के जुलाब का काम करता है। अतः जिन व्यक्तियोँ का काम हल्के जुलाब से चल जाए उनके लिए इसका सेवन उपयोगी होगा। इसे छोटे आधे चम्मच से एक चम्मच मात्रा मेँ कुनकुने गर्म पानी के साथ रात को सोते समय लेना चाहिए। आमातिसार यानि बार बार मरोङ के साथ थोङा थोङा चिकना आंव युक्त दस्त होने पर इसका सेवन सुबह करना चाहिए। चूर्ण की ज्यादा मात्रा का सेवन न करेँ क्योँकि मात्रा ज्यादा होने पर पेट मेँ मरोङ और पीङा हो सकती है। इसके सेवन से कब्ज, आंव, सिर दर्द, अजीर्ण, अफारा, गैस बढना, पेट का दर्द, गुदा का दर्द आदी नष्ट हो जाते है। लाभ हो जाने पर इसका सेवन बन्द कर दे-

अग्निमुख चूर्ण- 


गलत खानपान और तले हूए तेज मिर्च मसालेदार, खटाई युक्त पदार्थो तथा मांसाहार का प्रचलन बढ जाने से Hyperacidity, खट्टी डकारे आना, जी मिचलाना, गले मेँ चरपरा पानी आना, ठीक से भूख न लगना, अरुची, मन्दाग्नि, अपच और कब्ज रहना आम हो गया है। इन सबको नष्ट करने के लिए अग्निमुख चुर्ण का उपयोग लाभ न होने तक करना चाहिए। इसे आधा चम्मच मात्रा मेँ भोजन के बाद यूं ही जीभ पर रख कर चूस लेँ। गैस बढने और पेट फूलने पर इसका सेवन करने से तुरन्त गैस निकल जाती है-

स्वादिष्ट विरेचन चूर्ण- 


यह स्वादिष्ट विरेचक चुर्ण कब्ज का नाश कर दस्त लाता है। आंव, सिरदर्द, बवासीर, रक्त विकार, खुजली और त्वचारोग की चिकित्सा करने तथा किसी पौष्टिक योग का सेवन शुरू करने से पहले इस नुस्खे का सेवन कर पेट साफ कर लेना चाहिए। यह चूर्ण बच्चोँ, गर्भवती, नव प्रसूता स्त्री, कमजोर शरीर वाले और बूढे सभी के लिए निरापद रूप से सेवन योग्य है। आधा चम्मच से एक चम्मच मात्रा सोते समय कुनकुने गर्म पानी के साथ सेवन करे। इस चूर्ण की मात्रा आयु और आवश्यकता के अनुसार कम ज्यादा की जा सकती है-

पंचसम चूर्ण- 


इस चूर्ण को सुबह शाम या आवश्यकता पङने पर 3 से 6 ग्राम मात्रा मेँ कुनकुने गर्म पानी के साथ सेवन करना चाहिए। यह अफारा, गैस ट्रबल, पेट फूलना, वायु न निकलना, उदर शूल, पेट मे आंव बनना, आम वात, कब्ज, आम ज्वर, पेचिश, भोजन मे अरुचि, आंव के दस्त आदि उदर विकारोँ के लिए अत्यन्त लाभप्रद है-

नोट:- ये सभी चूर्ण बाजार मेँ मिल जायेगे।

उपचार और प्रयोग-