Thursday, February 19, 2015

देश में पहली बार आई ये मशीन, 10 साल पहले ही बता देगी किसे है कैंसर....!

*  अब 3 से 10 साल पहले महिलाओं में बच्चेदानी और पुरुषों में मुंह के कैंसर का पता लग जाएगा। अब तक दोनों किस्मों के कैंसर का पता तब लगता था, जब कैंसर अगली और जानलेवा स्टेज में पहुंच जाता था।

* इसके लिए मेडिकल कॅालेज में ह्यूमन पेपिलोमा वायरस (एचपीवी) सिस्टम लगाया गया है। मशीन में सैंपल डालने के साढ़े 3 घंटे बाद रिपोर्ट आ जाएगी। इस तरह की यह देश की पहली मशीन है।


* पंजाब में मुंह और बच्चेदानी के कैंसर के सबसे अधिक मरीज सामने रहे हैं। दोनों किस्मों के कैंसर को पहली स्टेज में डिटेक्ट करने के लिए यह मशीन लगाई गई है। कैंसर अरली डिटेक्शन के लिए इस तरह की यह देश की पहली मशीन है, जो बताएगी कि मरीज को यदि कैंसर होना है तो कितने समय में हो सकता है।

* पॉपुलेशन वेस्ड कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के तहत यह मशीन करीब 80 लाख में खरीदी गई है। पहले कैंसर पता लगाने के लिए पैप स्मीयर टेस्ट तकनीक अपनाई जाती थी, जिससे कैंसर का पूरी तरह से पता नहीं लग पाता था, और मरीज को लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था।


* एचपीवी मशीन सिर्फ सैंपल की जांच करके यह बताएगी कि मरीज को कैंसर कितने समय बाद होगा। यदि मरीज के अंदर कैंसर के सैल पाए जाते हैं तो मशीन कैंसर सेल का डीएनए टेस्ट करेगी, और बताएगी कि कैंसर कहां से आया है। बेक्टन डिक्नसन कंपनी के सर्विस मैनेजर हरजिंदर सिंह ने बताया कि मशीन पूरी तरह से ऑटोमेटिक है। मशीन में एक बार 30 सैंपल डाले जा सकते हैं। साढ़े 3 घंटे में रिपोर्ट तैयार हो जाएगी।



* पैथालॉजी डिपार्टमेंट के हेड डा. मंजीत सिंह बल ने बताया कि पंजाब में बढ़ते बच्चेदानी ओरल कैंसर के मरीजों की संख्या को देखते हुए मशीन मंगवाई गई है। यदि मरीज के अंदर कैंसर सैल का समय पर पता लग जाता है तो उसके इलाज में भी तेजी आएगी। समय पर कैंसर का इलाज संभव होगा। एचपीवी 3 घंटे में देगी सैंपल की रिपोर्ट।






* मशीन में एक मॉनिटर लगा है, जिसमें मशीन की हर एक्टिविटी दिखती है। मशीन के अंदर स्लाइड बनाकर एक साथ 30 सैंपल डाले जाते हैं। मशीन की मैग्नेटिक बीट्स वायरस को अलग कर देते हैं। डिस्पले पर जाता है कि मरीज के शरीर में कैंसर के सैल हैं या नहीं है।

प्रचंड तूफ़ान से टक्कर लेने वाला प्रयोग - Taker collision experiment By typhoon

माता बगुलामुखी को कलयुग में बहुत शक्तिशाली देवी के रूप में जाना जाता है। जिनकी कृपा से कार्यों में आने वाली विघ्न बाधाएं दूर होतीं हैं, संकट टल जाते हैं तथा साहस, पराक्रम आदि की प्राप्ति होती है बगुलामुखी यंत्र का प्रयोग मां बगुलामुखी का आशिर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है। तथा आज भी अनेक जातको की श्री बगुलामुखी यंत्र के विधिवत प्रयोग से विभिन्न प्रकार की मनोकामनाएं सिद्ध हुई हैं-



 

बगलामुखी-साधना भारत की प्राचीनतम दस महाविध्याओ में एक है और कलियुग में इसका प्रभाव पग -पग पे देख सकते है -

शत्रुओ पर हावी होने और उनका मान मर्दन करने तथा हारते हुए मुकदमो में भी सफलता पाने हेतु समस्त प्रकार से उन्नति के लिए बगुलामुखी यंत्र को श्रेष्ठ माना जाता है  यह यंत्र जिस हाथ पे बंधा होता है उस पर किया गया तांत्रिक प्रभाव भी निष्फल रहता है -



                                                                  पीताम्बरा देवी दतिया


बगलामुखी मंदिर मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित है। यह देश के लोकप्रिय शक्तिपीठों में से एक है। दतिया का यह मंदिर 'पीताम्बरा पीठ' के नाम से प्रसिद्ध है।मध्य प्रदेश के दतिया शहर में प्रवेश करते ही पीताम्बरा पीठ है। यहाँ पहले कभी श्मशान हुआ करता था, आज विश्वप्रसिद्ध मन्दिर है। पीताम्बरा पीठ की स्थापना एक सिद्ध संत, जिन्हें लोग स्वामीजी महाराज कहकर पुकारते थे, ने 1935 में की थी। श्री स्वामी महाराज ने बचपन से ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। वे यहाँ एक स्वतंत्र अखण्ड ब्रह्मचारी संत के रूप में निवास करते थे। स्वामीजी प्रकांड विद्वान व प्रसिद्ध लेखक थे। उन्हेंने संस्कृत, हिन्दी में कई किताबें भी लिखी थीं। गोलकवासी स्वामीजी महाराज ने इस स्थान पर 'बगलामुखी देवी' और धूमावती माई की प्रतिमा स्थापित करवाई थी। यहाँ बना वनखंडेश्वर मन्दिर महाभारत कालीन मन्दिरों में अपना विशेष स्थान रखता है-

स्थानील लोगों की मान्यता है कि मुकदमे आदि के सिलसिले में माँ पीताम्बरा का अनुष्ठान सफलता दिलाने वाला होता है। भारत में बगुलामुखी के तीन ही ऐतिहासिक मंदिर माने गये हैं, जो क्रमश: दतिया (मध्य प्रदेश), कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) और शाजापुर (मध्य प्रदेश) में हैं। दतिया स्थित बगुलामुखी मंदिर 'पीताम्बरा पीठ' के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह मंदिर महाभारत कालीन है। मान्यता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा चिरंजीवी होने के कारण आज भी इस मंदिर में पूजा अर्चना करने आते हैं-

इस मंदिर के परिसर में भगवान आशुतोष भी वनखंडेश्वर लिंग के रूप में विराजमान हैं। बगुलामुखी का यह मंदिर देश के लोकप्रिय शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि कभी इस स्थान पर श्मशान हुआ करता था, लेकिन आज एक विश्वप्रसिद्ध मन्दिर है। स्थानीय  लोगों की मान्यता है कि मुकदमे आदि के सिलसिले में माँ पीताम्बरा का अनुष्ठान सफलता दिलाने वाला होता है।इसी  मंदिर के प्रांगण में ही 'माँ धूमावती देवी' का मन्दिर है, जो भारत में भगवती धूमावती का सिर्फ एक मात्र मन्दिर है-

पीताम्बरा देवी की मूर्ति के हाथों में मुदगर, पाश, वज्र एवं शत्रुजिव्हा है। यह शत्रुओं की जीभ को कीलित कर देती हैं। मुकदमे आदि में इनका अनुष्ठान सफलता प्राप्त करने वाला माना जाता है। इनकी आराधना करने से साधक को विजय प्राप्त होती है। शुत्र पूरी तरह पराजित हो जाते हैं। यहाँ के पंडित तो यहाँ तक कहते हैं कि, जो राज्य आतंकवाद व नक्सलवाद से प्रभावित हैं, वह माँ पीताम्बरा की साधना व अनुष्ठान कराएँ, तो उन्हें इस समस्या से निजात मिल सकती है-






श्री बगुलामुखी यंत्र के प्रयोग का परामर्श नये कार्यों को शुरु करने के लिए तथा उनमें सफलता प्राप्त करने के लिए, कार्यों में आने वाली विघ्न बाधाओं को दूर करने के लिए, पराक्रम, साहस तथा युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए, न्यायालय आदि में चल रहे मुकद्दमों में अनुकूल निर्णय प्राप्त करने के लिए, चुनाव आदि में विजय प्राप्त करने के लिए, श्री बगुलामुखी कृपा तथा अन्य बहुत सी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देते हैं तथा इस यंत्र को विधिवत स्थापित करने वाले तथा इसकी विधिवत पूजा करने वाले जातक अपने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लाभ के अवसर प्राप्त करने में सफल होते हैं-

श्री बगुलामुखी यंत्र को स्थापित करने से प्राप्त होने वाले लाभ उस जातक को पूर्ण रूप से तभी प्राप्त हो सकते हैं जब उसके द्वारा स्थापित किया जाने वाला श्री बगुलामुखी यंत्र शुद्धिकरण, प्राण प्रतिष्ठा तथा ऊर्जा संग्रह की प्रक्रियाओं के माध्यम से विधिवत बनाया गया हो तथा विधिवत न बनाए गए श्री बगुलामुखी यंत्र को स्थापित करना कोई विशेष लाभ प्रदान नहीं होता-

किसी भी श्री बगुलामुखी यंत्र की वास्तविक शक्ति इस यंत्र को श्री बगुलामुखी मंत्रों द्वारा प्रदान की गई शक्ति के अनुपात में ही होती है तथा इस प्रकार जितने अधिक मंत्रों की बगुलामुखी के साथ किसी श्री बगुलामुखी यंत्र को ऊर्जा प्रदान की गई हो, उतना ही वह श्री बगुलामुखी यंत्र शक्तिशाली होगा। किसी भी श्री बगुलामुखी यंत्र को लाभ प्रदान करने के लिए कम से कम 11,000 श्री बगुलामुखी मंत्रों की सहायता से ऊर्जा प्रदान की जानी चाहिए, तथा बिना ऊर्जा के संग्रह वाला श्री बगुलामुखी यंत्र धातु के एक टुकड़े के समान ही होता है जिसे 60 रूपये के मूल्य में प्राप्त किया जा सकता है-

यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि श्री बगुलामुखी यंत्र को विधिवत बनाने की प्रक्रिया में इस यंत्र को ऊर्जा प्रदान करने वाला चरण सबसे अधिक महत्वपूर्ण है तथा यदि ऊर्जा संग्रहित करने की इस प्रक्रिया को यदि विधिवत तथा उचित प्रकार से न किया जाए तो कोई विशेष फल प्रदान करने में सक्षम नही होगा-

किसी भी श्री बगुलामुखी यंत्र के भली प्रकार से कार्य करने तथा जातक को लाभ प्रदान करने के लिए इस यंत्र को विधिवत बनाया जाना अति आवश्यक है। किन्तु एक ऐसे श्री बगुलामुखी यंत्र की, जिसे किसी व्यक्ति विशेष के लिए संकल्पित करके अकेले ही यंत्र को ऊर्जा प्रदान की गई हो, किसी ऐसे श्री बगुलामुखी यंत्र के साथ बिल्कुल भी तुलना नहीं की जा सकती जिसे सैंकड़ों अन्य श्री बगुलामुखी यंत्रों के साथ बिना किसी विशेष संकल्प के उर्जा प्रदान करने की चेष्टा की गई हो क्योंकि इनमें से प्रथम श्रेणी का श्री बगुलामुखी यंत्र विधिवत बनाया गया तथा उत्तम फल प्रदान करने में सक्षम है जबकि दूसरे यंत्र को उचित विधि से नहीं बनाया गया है ऊर्जा प्रदान करने के अतिरिक्त प्रत्येक श्री बगुलामुखी यंत्र को विशिष्ट विधियों के माध्यम से शुद्धिकरण, किसी व्यक्ति विशेष को ही अपने शुभ फल प्रदान करने की क्षमता प्रदान करने वाली प्रक्रिया से किया जाता है तथा अंत में जिससे यह यंत्र अपने फल देने में सक्षम हो जाता है-

इसलिए अपने लिए श्री बगुलामुखी यंत्र स्थापित करने से पहले सदा यह सुनिश्चित करें कि आपके द्वारा स्थापित किया जाने वाला श्री बगुलामुखी यंत्र उपरोक्त सभी प्रक्रियों में से निकलने के बाद विधिवत केवल आपके लिए ही बनाया गया है। विधिवत बनाया गया श्री बगुलामुखी यंत्र प्राप्त करने के पश्चात आपको इसे अपने ज्योतिषि के परामर्श के अनुसार अपने घर में पूजा के स्थान अथवा अपने बटुए अथवा अपने गले में स्थापित करना होता है। उत्तम फलों की प्राप्ति के लिए श्री बगुलामुखी यंत्र को मंगलवार वाले दिन स्थापित करना चाहिए तथा घर में स्थापित करने की स्थिति में इसे पूजा के स्थान में स्थापित करना चाहिए-

श्री बगुलामुखी यंत्र की स्थापना के दिन नहाने के पश्चात अपने यंत्र को सामने रखकर 11 या 21 बार श्री बगुलामुखी मंत्र का जाप करें तथा तत्पश्चात अपने श्री बगुलामुखी यंत्र पर थोड़े से गंगाजल अथवा कच्चे दूध के छींटे दें, मां बगुलामुखी से इस यंत्र के माध्यम से अधिक से अधिक शुभ फल प्रदान करने की प्रार्थना करें, तथा तत्पश्चात इस यंत्र को इसके लिए निश्चित किये गये स्थान पर स्थापित कर दें। तथा इस यंत्र से निरंतर शुभ फल प्राप्त करते रहने के लिए आपको इस यंत्र की नियमित रूप से पूजा करनी है। प्रतिदिन स्नान करने के पश्चात अपने श्री बगुलामुखी यंत्र की स्थापना वाले स्थान पर जाएं तथा इस यंत्र को नमन करके 11 या 21 श्री बगुलामुखी मंत्रों के उच्चारण के पश्चात अपने इच्छित फल को इस यंत्र से मांगें-

यदि आपने अपने श्री बगुलामुखी यंत्र को अपने बटुए अथवा गले में धारण किया है तो स्नान के बाद इसे अपने हाथ में लें तथा उपरोक्त विधि से इसका पूजन करें तथा अपना इच्छित फल इससे मांगें। अपने पास स्थापित किए गये श्री बगुलामुखी यंत्र की नियमित रूप से पूजा करने से आपके और आपके श्री बगुलामुखी यंत्र के मध्य एक बगुलामुखीशाली संबंध स्थापित हो जाता है जिसके कारण यह यंत्र आपको अधिक से अधिक लाभ प्रदान करता है-

एक ऐतिहासिक सत्य:-



माँ पीताम्बरा बगलामुखी का स्वरूप रक्षात्मक है। पीताम्बरा पीठ मन्दिर के साथ एक ऐतिहासिक सत्य भी जुड़ा हुआ है। सन् 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। भारत के मित्र देशों रूस तथा मिस्र ने भी सहयोग देने से मना कर दिया था। तभी किसी योगी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू से स्वामी महाराज से मिलने को कहा। उस समय नेहरू दतिया आए और स्वामीजी से मिले। स्वामी महाराज ने राष्ट्रहित में एक यज्ञ करने की बात कही। यज्ञ में सिद्ध पंडितों, तांत्रिकों व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को यज्ञ का यजमान बनाकर यज्ञ प्रारंभ किया गया। यज्ञ के नौंवे दिन जब यज्ञ का समापन होने वाला था तथा पूर्णाहुति डाली जा रही थी, उसी समय 'संयुक्त राष्ट्र संघ' का नेहरू जी को संदेश मिला कि चीन ने आक्रमण रोक दिया है। मन्दिर प्रांगण में वह यज्ञशाला आज भी बनी हुई है-

शत्रुओं का नाश करे बगुलामुखी यंत्र:-



आज लोग अपनी विफलता से दुखी नहीं, बल्कि पड़ोसी की सफलता से दुखी हैं। ऐसे में उन लोगों को सफलता देने के लिए माताओं में माता बगलामुखी (वाल्गामुखी) मानव कल्याण के लिये कलियुग में प्रत्यक्ष फल प्रदान करती रही हैं। आज इन्हीं माता, जो दुष्टों का संहार करती हैं। अशुभ समय का निवारण कर नई चेतना का संचार करती हैं। ऐसी माता के बारे में मैं अपनी अल्प बुद्धि से आपकी प्रसन्नता के लिए इनकी सेवा आराधना पर कुछ कहने का साहस कर रहा हूं। मुझे आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि मैं माता वाल्गामुखी (बगलामुखी) की जो बातें आपसे कह रहा हूं अगर आप उसका तनिक भी अनुसरण करते हैं तो माता आप पर कृपा जरूर करेंगी-

इनकी साधना अथवा प्रार्थना में आपकी श्रद्धा और विश्वास असीम हो तभी मां की शुभ दृष्टि आप पर पड़ेगी। इनकी आराधना करके आप जीवन में जो चाहें जैसा चाहे वैसा कर सकते हैं-

आजकल इनकी सर्वाधिक आराधना राजनेता लोग चुनाव जीतने और अपने शत्रुओं को परास्त करने में अनुष्ठान स्वरूप करवाते हैं। इनकी आराधना करने वाला शत्रु से कभी परास्त नहीं हो सकता, वरन उसे मनमाना कष्टï पहुंच सकता है। वर्ष 2004 के चुनाव में तो कई राजनेताओं जिनका नाम लेना उचित नहीं है ने माता बगलामुखी की आराधना करके (पंडितों द्वारा) चुनाव भी जीते और अच्छे मंत्रालय भी प्राप्त किये-

माता की यही आराधना युद्ध, वाद-विवाद मुकदमें में सफलता, शत्रुओं का नाश, मारण, मोहन, उच्चाटन, स्तम्भन, देवस्तम्भन, आकर्षण कलह, शत्रुस्तभन, रोगनाश, कार्यसिद्धि, वशीकरण व्यापार में बाधा निवारण, दुकान बाधना, कोख बाधना, शत्रु वाणी रोधक आदि कार्यों की बाधा दूर करने और बाधा पैदा करने दोनों में की जाती है। साधक अपनी इच्छानुसार माता को प्रसन्न करके इनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है। जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया जा चुका है कि माता श्रद्धा और विश्वास से आराधना (साधना) करने पर अवश्य प्रसन्न होंगी, लेकिन ध्यान रहे इनकी आराधना (अनुष्ठान) करते समय ब्रह्मचर्य परमावश्यक है-

ब्लॉग लेखक का प्रयोग-


आपके लिए पहली बार इस लेख में इस लिए उल्लेख कर रहा हूँ क्युकि मेने इस विद्या का अपने जीवन में समावेश किया है और पूरे जीवन में मेने खुद को सुरक्षित ही पाया है कितना भी बलवान शत्रु हो कोई कितना भी आपका अनिष्ट चाहने वाला हो आपका बाल बांका भी नहीं कर सकेगा इसके विपरीत उसे ही मुंह की खानी पड़ेगी मेने ये प्रयोग सन 1991 में इलाहबाद में शुरू किया था और आज तक देनिक पूजा में करता रहा हूँ -

गृहस्थ भाइयों के लिये मैं माता की आराधना का सरल उपाय बता रहा हूं। आप इसे करके शीघ्र फल प्राप्त कर सकते हैं। किसी भी देवी-देवता का अनुष्ठान (साधना) आरम्भ करने बैठे तो सर्वप्रथम शुभ मुर्हूत, शुभ दिन, शुभ स्थान, स्वच्छ वस्त्र, नये ताम्र पूजा पात्र, बिना किसी छल कपट के शांत चित्त, भोले भाव से यथाशक्ति यथा सामग्री, ब्रह्मचर्य के पालन की प्रतिज्ञा कर यह साधना आरम्भ कर सकते हैं। याद रहे अगर आप अति निर्धन हो तो केवल पीले पुष्प, पीले वस्त्र, हल्दी की 108 दाने की माला और दीप जलाकर माता की प्रतिमा, यंत्र आदि रखकर शुद्ध आसन कम्बल, कुशा या मृगचर्य जो भी हो उस पर बैठकर माता की आराधना कर आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं। माता बगलामुखी की आराधना के लिये जब सामग्री आदि इकट्ठा करके शुद्ध आसन पर बैठें (उत्तर मुख) तो दो बातों का ध्यान रखें, पहला तो यह कि सिद्धासन या पद्मासन हो, जप करते समय पैर के तलुओं और गुह्य स्थानों को न छुएं शरीर गला और सिर सम स्थित होना चाहिए-

इसके पश्चात गंगाजल से छिड़काव कर (स्वयं पर) यह मंत्र पढें-

     "अपवित्र: पवित्रो वा सर्वावस्थाङ्गतोऽपिवा, य: स्मरेत, पुण्डरी काक्षं स बाह्य अभ्यांतर: शुचि:।"

उसके बाद इस मंत्र से दाहिने हाथ से आचमन करें-

      "ऊं केशवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, ऊं माधवाय नम:अन्त में ऊं हृषीकेशाय नम: "

कहके हाथ धो लेना चाहिये-

इसके बाद गायत्री मंत्र पढ़ते हुए तीन बार प्राणायाम करें। चोटी बांधे और तिलक लगायें। अब पूजा दीप प्रज्जवलित करें। फिर विघ्नविनाशक गणपति का ध्यान करें। याद रहे ध्यान अथवा मंत्र  सम्बंधित देवी-देवता का टेलीफोन नंबर है-

जैसे ही आप मंत्र का उच्चारण करेंगे, उस देवी-देवता के पास आपकी पुकार तुरंत पहुंच जायेगी। इसलिये मंत्र शुद्ध पढऩा चाहिये। मंत्र का शुद्ध उच्चारण न होने पर कोई फल नहीं मिलेगा, बल्कि नुकसान ही होगा। इसीलिए उच्चारण पर विशेष ध्यान रखें। अब आप गणेश जी के बाद सभी देवी-देवादि कुल, वास्तु, नवग्रह और ईष्ट देवी-देवतादि को प्रणाम कर आशीर्वाद लेते हुए कष्ट का निवारण कर शत्रुओं का संहार करने वाली वाल्गा (बंगलामुखी) का विनियोग मंत्र दाहिने हाथ में जल लेकर पढ़ें-

        ऊं अस्य श्री बगलामुखी मंत्रस्य नारद ऋषि: त्रिष्टुप्छन्द: बगलामुखी देवता, ह्लींबीजम् स्वाहा शक्ति: ममाभीष्ट सिध्यर्थे जपे विनियोग:  (जल नीचे गिरा दें)।

अब माता का ध्यान करें, याद रहे सारी पूजा में हल्दी और पीला पुष्प अनिवार्य रूप से होना चाहिए-

ध्यान मन्त्र :-


मध्ये सुधाब्धि मणि मण्डप रत्न वेद्यां,
सिंहासनो परिगतां परिपीत वर्णाम,
पीताम्बरा भरण माल्य विभूषिताड्गीं
देवीं भजामि धृत मुद्गर वैरिजिह्वाम
जिह्वाग्र मादाय करेण देवीं,
वामेन शत्रून परिपीडयन्तीम,
गदाभिघातेन च दक्षिणेन,
पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि॥

अपने हाथ में पीले पुष्प लेकर उपरोक्त ध्यान का शुद्ध उच्चारण करते हुए माता का ध्यान करें। उसके बाद यह मंत्र जाप करें। साधक ध्यान दें, अगर पूजा मैं विस्तार से कहूंगा तो आप भ्रमित हो सकते हैं। परंतु श्रद्धा-विश्वास से इतना ही करेंगे जितना कहा जा रहा है तो भी उतना ही लाभ मिलेगा। जैसे विष्णुसहस्र नाम का पाठ करने से जो फल मिलता है वही ऊं नमोऽभगवते वासुदेवाय से, यहां मैं इसलिये इसका जिक्र कर रहा हूं ताकि आपके मन में कोई संशय न रहे। राम कहना भी उतना ही फल देगा। अत: थोड़े मंत्रो के दिये जाने से कोई संशय न करें। अब जिसका आपको इंतजार था उन माता बगलामुखी के मंत्र को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं-

मंत्र है :-



 "ऊं ह्लीं बगलामुखि! सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं विनाशय ह्लीं ऊंस्वाहा। "

इस मंत्र का जाप पीली हल्दी की गांठ की माता से करें। आप चाहें तो इसी मंत्र से माता की षोड्शोपचार विधि से पूजा भी कर सकते हैं। आपको कम से कम पांच बातें पूजा में अवश्य ध्यान रखनी है-

1. ब्रह्मचर्य, 
2. शुद्घ और स्वच्छ आसन 
3. गणेश नमस्कार और घी का दीपक 
4. ध्यान और शुद्ध मंत्र का उच्चारण 
5. पीले वस्त्र पहनना और पीली हल्दी की माला से जाप करना

आप कहेंगे मैं बार-बार यही सावधानी बता रहा हूं। तो मैं कहूंगा इससे गलती करोगे तो माता शायद ही क्षमा करें। इसलिये जो आपके वश में है, उसमें आप फेल न हों। बाकी का काम मां पर छोड़ दें। इतनी सी बातें आपकी कामयाबी के लिये काफी हैं-


अधिकारियों को वश में करने अथवा शत्रुओं द्वारा अपने पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए यह अनुष्ठान पर्याप्त है। तिल और चावल में दूध मिलाकर माता का हवन करने से श्री प्राप्ति होती हैै और दरिद्रता दूर भागती है। गूगल और तिल से हवन करने से कारागार से मुक्ति मिलती है। अगर वशीकरण करना हो तो उत्तर की ओर मुख करके और धन प्राप्ति के लिए पश्चिम की ओर मुख करके हवन करना चाहिए। अनुभूत प्रयोग कुछ इस प्रकार है। मधु, शहद, चीनी, दूर्वा, गुरुच और धान के लावा से हवन करने से समस्त रोग शान्त हो जाते हैं। गिद्ध और कौए के पंख को सरसों के तेल में मिलाकर चिता पर हवन करने से शत्रु तबाह हो जाते हैं। भगवान शिव के मन्दिर में बैठकर सवा लाख जाप फिर दशांश हवन करें तो सारे कार्य सिद्ध हो जाते हैं। मधु घी, शक्कर और नमक से हवन आकर्षण (वशीकरण) के लिए प्रयोग कर सकते हैं-

इसके अतिरिक्त भी बड़े प्रयोग हैं किन्तु इसका कहीं गलत प्रयोग न कर दिया जाए जो समाज के लिए हितकारी न हो इसलिये देना उचित नहीं है। अत: आप स्वयं के कल्याण के लिए माता की आराधना कर लाभ उठा सकते हैं। यहां संक्षिप्त विधि इसलिये दी गई है कि सामान्य प्राणी भी माता की आराधना कर लाभान्वित हो सकें। यह गृहस्थ भाइयों के लिए भी पर्याप्त है-

यदि आप सभी उपरोक्त साधन भी न कर सके तो भी आप अपने जीवन में साधारण रूप से उनका एक "माला मन्त्र" ही प्रयोग कर ले ये आप नित्य की पूजा में एक बार पढ़ सकते है उससे भी आपके काफी काम होने लगेगे जो आपको छोटी -छोटी कठिनाइयो से बचाते रहेगे क्युकि आज के युग में समय न होने के कारण सम्भब नहीं है कि आप विधि पूर्वक करे -

अब साधारण रूप से इस प्रयोग का वर्णन कर रहा हूँ लेकिन गृहस्थ जीवन में सिर्फ एक "माला मन्त्र" का ही जाप कर ले क्युकि ये आज के युग में सभी के लिए संभव नहीं है कि पूरा विधि पूर्वक कर सके -सिर्फ साधारण प्रयोग से भी जीवन की काफी कठिनाइयाँ हल हो जाती है -

साधारण व्यक्तियों के लिए बगलामुखी माला मंत्र बहुत सरल और उपयोगी सिद्ध हो सकता है। साधक को इस माला मंत्र का 108 बार पठन करना होता है। यह मंत्र अधिक क्लिष्ट भाषा में भी नहीं है और साधारण व्यक्ति भी इसको पढ़ सकता है। इस गोपनीय माला मंत्र में गजब की शक्ति है। यह शत्रु भय समाप्त करने वाला देखा गया है। मुख्य रूप से यह मंत्र उन विवाहित दंपतियों के लिए अधिक लाभकारी सिद्ध हो सकता है, जिन स्त्री-पुरुषों में भारी मनमुटाव हो रहा हो, पति-पत्नी में मतभेद हो तथा तलाक की स्थिति आ रही हो-


यदि इस माला मंत्र को कोई भी पत्नी, या पति, जो भी पीड़ित है, दुःखी है, विधानपूर्वक, स्नान कर, शुद्ध पीले वस्त्र धारण कर, रात्रि 9 बजे के पश्चात्, दक्षिण दिशा में बैठ कर 108 बार पाठ करे, तो निश्चित ही पारिवारिक शत्रुता, झगड़े, वैमनस्य समाप्त हो जाते हंै। यह अनुभव रहा है कि कोई पत्नी, या पति अपने जीवन साथी से दुःखी हो, या उसकी आदतों से परेशान हो, घर में नित्य झगड़े होते हों, उसके समाधान के लिए यह प्रयोग संपन्न किया जा सकता है-

पूजन विधि:-



सर्वप्रथम पीत वस्त्र बिछा कर उसपर पीले चावल की ढेरी बनावें। सामने पीतांबरा का चित्र रख कर, या चावल की ढेरी को पीतांबरा देवी मान कर उसकी विधिवत पंचमोपचार से पूजा करें। पीले पुष्प, पीले चावल आदि का उपयोग करें। घी, या तेल का दीपक जला कर सर्वप्रथम गुरु पूजा, फिर पीतांबरा देवी की पूजा करें। इसके पश्चात् संकल्प करें कि मैं अपनी अमुक समस्या के समाधान हेतु (समस्याः पारिवारिक कष्ट, पति, या पत्नी के अत्याचार से दुःखी हों आदि) पीतांबरा मंत्र माला 108 बार जप कर रहा हूं। मुझे इससे मुक्ति दिलावें-

मेरा अनुभव रहा है कि जिसने भी इसका पाठ किया, उसे सफलता प्राप्त हुई है। बल्कि इस बात की गारंटी है -

************************माला -मन्त्र *****************



ॐ नमो भगवति, ˙ नमो वीर प्रताप विजय भगवति, बगलामुखि! मम सर्वनिन्दकानां सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय, जिह्नां कीलय, बुद्धिं विनाशय विनाशय, अपर-बुद्धिं कुरू कुरू, आत्मविरोधिनां शत्रुणां शिरो, ललाटं, मुखं, नेत्र, कर्ण, नासिकोरू, पद, अणु-अणु, दंतोष्ठ, जिह्नां, तालु, गुह्य, गुदा, कटि, जानु, सर्वांगेषु केशादिपादांतं पादादिकेशपर्यन्तं स्तंभय स्तंभय, खें खीं मारय मारय, परमंत्र, परयंत्र, परतंत्राणि छेदय छेदय, आत्ममंत्र तंत्राणि रक्ष रक्ष, ग्रहं निवारय निवारय, व्याधिं विनाशय विनाशय दुःखं हर हर, दारिद्रयं निवारय निवारय, सर्वमंत्र स्वरूपिणि दुष्टग्रह भूतग्रह पाषाणग्रह सर्व चांडालग्रह यक्ष किन्नर किंपुरूष ग्रह भूत प्रेत पिशाचानां शाकिनी डाकिनीग्रहाणां पूर्व दिशं बंधय बंधय, वार्तालि! मां रक्ष रक्ष, दक्षिण दिशं बंधय बंधय, स्वप्नवार्तालि मां रक्ष रक्ष, पश्चिमदिशं बंधय बंधय उग्रकालि मां रक्ष रक्ष, पाताल दिशं बंधय बंधय बगला परमेश्वरि मां रक्ष रक्ष, सकल रोगान् विनाशय विनाशय, शत्रु पलायनम् पंचयोजनमध्ये राजजनस्वपचं कुरू कुरू, शत्रुन् दह दह, पच पच, स्तंभय मोहय मोहय, आकर्षण-आकर्षय, मम शत्रुन् उच्चाटय उच्चाटय, ींीं फट्स्वाहा !

यू ट्यूब पे आप इस मन्त्र को ध्यान से सुने :-


https://youtu.be/SPjsXgqRdnk

उपचार और प्रयोग-


Tuesday, February 17, 2015

अस्थमा क्या है करे ये उपाय -

जब किसी व्यक्ति की सूक्ष्म श्वास नलियों में कोई रोग उत्पन्न हो जाता है तो उस व्यक्ति को सांस लेने मे परेशानी होने लगती है जिसके कारण उसे खांसी होने लगती है। इस स्थिति को दमा रोग कहते हैं-





अस्थमा (Asthma) एक गंभीर बीमारी है, जो श्वास नलिकाओं को प्रभावित करती है। श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर-बाहर करती हैं-

अस्थमा होने पर इन नलिकाओं की भीतरी दीवार में सूजन होता है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी बेचैन करनेवाली चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और उस स्थिति में फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है। इससे खांसी, नाक बजना, छाती का कड़ा होना, रात और सुबह में सांस लेने में तकलीफ आदि जैसे लक्षण पैदा होते हैं।

अस्थमा एक अथवा एक से अधिक पदार्थों (एलर्जेन) के प्रति शारीरिक प्रणाली की अस्वीकृति (एलर्जी) है। इसका अर्थ है कि हमारे शरीर की प्रणाली उन विशेष पदार्थों को सहन नहीं कर पाती और जिस रूप में अपनी प्रतिक्रिया या विरोध प्रकट करती है, उसे एलर्जी कहते हैं। हमारी श्वसन प्रणाली जब किन्हीं एलर्जेंस के प्रति एलर्जी प्रकट करती है तो वह अस्थमा होता है। यह साँस संबंधी रोगों में सबसे अधिक कष्टदायी है। अस्थमा के रोगी को सांस फूलने या साँस न आने के दौरे बार-बार पड़ते हैं और उन दौरों के बीच वह अकसर पूरी तरह सामान्य भी हो जाता है।

दमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है लेकिन इस पर नियंत्रण जरूर किया जा सकता है,ताकि दमे से पीड़ित व्यक्ति सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।अस्थमा तब तक ही नियंत्रण में रहता है, जब तक मरीज जरूरी सावधाननियां बरत रहा है।

इस रोग के लक्षण व्यक्ति के अनुसार बदलते हैं। अस्थमा के कई लक्षण तो ऐसे हैं, जो अन्य श्वास संबंधी बीमारियों के भी लक्षण हैं। इन लक्षणों को अस्थमा के अटैक के लक्षणों के रूप में पहचानना जरूरी है।दमा रोग में रोगी को सांस लेने तथा सांस को बाहर छोड़ने में काफी जोर लगाना पड़ता है। जब मनुष्य के शरीर में पाई जाने वाले फेफड़ों की नलियों (जो वायु का बहाव करती हैं) की छोटी-छोटी तन्तुओं (पेशियों) में अकड़न युक्त संकोचन उत्पन्न होता है तो फेफड़ा वायु (श्वास) की पूरी खुराक को अन्दर पचा नहीं पाता है। जिसके कारण रोगी व्यक्ति को पूर्ण श्वास खींचे बिना ही श्वास छोड़ देने को मजबूर होना पड़ता है।

इस अवस्था को दमा या श्वास रोग कहा जाता है। दमा रोग की स्थिति तब अधिक बिगड़ जाती है तब रोगी को श्वास लेने में बहुत दिक्कत आती है क्योंकि वह सांस के द्वारा जब वायु को अन्दर ले जाता है तो प्राय: प्रश्वास (सांस के अन्दर लेना) में कठिनाई होती है तथा नि:श्वास (सांस को बाहर छोड़ना) लम्बे समय के लिए होती हैं। दमा रोग से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेते समय हल्की-हल्की सीटी बजने की आवाज भी सुनाई पड़ती है।

जब दमा रोग से पीड़ित रोगी का रोग बहुत अधिक बढ़ जाता है तो उसे दौरा आने की स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक दिक्कत आती है तथा व्यक्ति छटपटाने लगता है। जब दौरा अधिक क्रियाशील होता है तो शरीर में ऑक्सीजन के अभाव के कारण रोगी का चेहरा नीला पड़ जाता है। यह रोग स्त्री-पुरुष दोनों को हो सकता है। जब दमा रोग से पीड़ित रोगी को दौरा पड़ता है तो उसे सूखी खांसी होती है और ऐंठनदार खांसी होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी चाहे कितना भी बलगम निकालने के लिए कोशिश करे लेकिन फिर भी बलगम बाहर नहीं निकलता है। अस्थमा के सभी रोगियों को रात के समय, खासकर सोते हुए, ज्यादा कठिनाई महसूस होती है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को रोग के शुरुआती समय में खांसी, सरसराहट और सांस उखड़ने के दौरे पड़ने लगते हैं। दमा रोग से पीड़ित रोगी को वैसे तो दौरे कभी भी पड़ सकते हैं लेकिन रात के समय में लगभग 2 बजे के बाद दौरे अधिक पड़ते हैं। दमा रोग से पीड़ित रोगी को कफ सख्त, बदबूदार तथा डोरीदार निकलता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी को सांस लेनें में बहुत अधिक कठिनाई होती है। सांस लेते समय अधिक जोर लगाने पर रोगी का चेहरा लाल हो जाता है। लगातार छींक आना  सामान्यतया अचानक शुरू होता है  यह किस्तों मे आता है  रात या अहले सुबह बहुत तेज होता है  ठंडी जगहों पर या व्यायाम करने से या भीषण गर्मी में तीखा होता है  दवाओं के उपयोग से ठीक होता है, क्योंकि इससे नलिकाएं खुलती हैं  बलगम के साथ या बगैर खांसी होती है  सांस फूलना, जो व्यायाम या किसी गतिविधि के साथ तेज होती है

खान-पान के गलत तरीके से दमा रोग हो सकता है।  मानसिक तनाव, क्रोध तथा अधिक भय के कारण भी दमा रोग हो सकता है।  खून में किसी प्रकार से दोष उत्पन्न हो जाने के कारण भी दमा रोग हो सकता है।  नशीले पदार्थों का अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।  खांसी, जुकाम तथा नजला रोग अधिक समय तक रहने से दमा रोग हो सकता है।  नजला रोग होने के समय में संभोग क्रिया करने से दमा रोग हो सकता है।  भूख से अधिक भोजन खाने से दमा रोग हो सकता है।  मिर्च-मसाले, तले-भुने खाद्य पदार्थों तथा गरिष्ठ भोजन करने से दमा रोग हो सकता है।  फेफड़ों में कमजोरी, हृदय में कमजोरी, गुर्दों में कमजोरी, आंतों में कमजोरी, स्नायुमण्डल में कमजोरी तथा नाकड़ा रोग हो जाने के कारण दमा रोग हो जाता है।  मनुष्य की श्वास नलिका में धूल तथा ठंड लग जाने के कारण दमा रोग हो सकता है।  धूल के कण, खोपड़ी के खुरण्ड, कुछ पौधों के पुष्परज, अण्डे तथा ऐसे ही बहुत सारे प्रत्यूजनक पदार्थों का भोजन में अधिक सेवन करने के कारण दमा रोग हो सकता है।

मनुष्य के शरीर की पाचन नलियों में जलन उत्पन्न करने वाले पदार्थों का सेवन करने से भी दमा रोग हो सकता है।  मल-मूत्र के वेग को बार-बार रोकने से दमा रोग हो सकता है।

धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ रहने या धूम्रपान करने से दमा रोग हो सकता है।यदि गर्भावस्था के दौरान कोई महिला तंबाकू के धुएं के बीच रहती है, तो उसके बच्चे को अस्थमा होने का खतरा होता है। औषधियों का अधिक प्रयोग करने के कारण कफ सूख जाने से दमा रोग हो जाता है।

जानवरों से (जानवरों की त्वचा, बाल, पंख या रोयें से) ठंडी हवा या मौसमी बदलाव  मजबूत भावनात्मक मनोभाव (जैसे रोना या लगातार हंसना) और तनाव  पारिवारिक इतिहास, जैसे  की परिवार में पहले किसी को अस्थमा रहा हो तो आप को अस्थमा होने की सम्भावना है।  मोटापे से भी अस्थमा हो सकता है। अन्य समस्याएं भी हो सकती हैं। सिर्फ पदार्थ ही नहीं बल्कि भावनाओं से भी दमे का दौरा शुरू हो सकता है। जैसे क्रोध, रोना व विभिन्न प्रकार की उत्तेजनाएं।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।घर में या अस्थमा से प्रभावित लोगों के आस -पास धूम्रपान न करें संभव हो तो धूम्रपान ही करना बंद कर दें क्योंकि अस्थमा से प्रभावित कुछ लोगों को कपडों पर धुएं की महक से ही अटैक आ सकता है |

इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में लेसदार पदार्थ तथा मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए। रोगी व्यक्ति को धूल तथा धुंए भरे वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है। रोगी व्यक्ति को मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ो से बचना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब, तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।  एयरटाइट गद्दे .बॉक्स स्प्रिंग और तकिए के कवर का इस्तेमाल करें ये वे चीजें है जहां पर अक्सर धूल-कण होते है जो अस्थमा को ट्रिगर करते है पालतू जानवरों को हर हफ्ते नहलाएं,इससे आपके घर में गंदगी पर कंट्रोल रहेगा |

अस्थमा से प्रभावित बच्चों को उनकी उम्र वाले बच्चों के साथ सामान्य गतिविधियों में भाग लेने दें |  अस्थमा के बारे में अपनी और या अपने बच्चे की जानकारी बढाएं इससे इस बीमारी पर अच्छी तरह से कंट्रोल करने की समझ बढेगी |  बेड सीट और मनपसंद स्टफड खिलोंनों को हर हफ्ते धोंए वह भी अच्छी क्वालिटीवाल एलर्जक को घटाने वाले डिटर्जेंट के साथ |  सख्त सतह वाले कारपेंट अपनाए |  एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है | किसी तरह की तकलीफ होने पर या आपकी दवाइयों के आप पर बेअसर होने पर अपने डॉक्टर से संर्पक करें |

यदि आपके घर में पालतू जानवर है तो उसे अपने विस्तर पर या बेडरूम में न आने दें | पंखों वाले तकिए का इस्तेमाल न करें |  मोल्ड की संभावना वाली जगहों जैसे गार्डन या पत्तियों के ढेरों में काम न करें और न ही खेलें |  दोपहर के वक्त जब परागकणों की संख्या बढ जाती है बाहर न ही काम करें और न ही खेलें |  अस्थमा से प्रभावित व्यक्ति से किसी तरह का अलग व्यवहार न करें |

अस्थमा का अटैक आने पर न घबराएं.इससे प्रॉब्लम और भी बढ जाएगी. ये बात उन माता-पिता को ध्यान देने वाली है जिनके बच्चों को अस्थमा है अस्थमा अटैक के दौरान बच्चों को आपकी प्रतिक्रिया का असर पडता है यदि आप ही घबरा जाएंगे तो आपको देख उनकी भी घबराहट और भी बढ सकती है | एलर्जी की जांच कराएं इसकी मदद से आप अपने अस्थमा ट्रिगर्स मूल कारण की पहचान कर सकते है

दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।

सबसे पहले पेट पर मिट्टी की पट्टी सुबह-शाम रखकर कब्ज के कारण आतों में सचित मल को मुलायम करे। तत्पश्चात एनिमा या वस्ति क्रिया अथवा अरंडी के तेल से ‘गणेश क्रिया’ करके कब्ज को तोड़े।

नाक के बढ़े हुए मास या हड्डी से छुटकारा पाने के लिए तेल नेति, रबर नेति व नमक पड़े हुए गर्म पानी से जल नेति करे।

फेफड़े में बसी ठडक निकालने के लिए छाती और पीठ पर कोई गर्म तासीर वाला तेल लगाकर ऊपर से रुई की पर्त बिछाकर रात भर या दिन भर बनियान पहने रहें।

बायीं नासिका के छिद्र में रुई लगाकर बन्द कर लेने से दाहिनी नासिका ही चलेगी। इस स्वर चिकित्सा से दमा के रोगियों को बहुत आराम मिलता है।

भोजन में प्रात: तुलसी, अदरक, गुलबनफसा आदि की चाय या सब्जी का सूप, दोपहर में सादी रोटी व हरी सब्जी, गर्म दाल, तीसरे पहर सूप या देशी चाय और रात्रि में सादे तरीके से बनी मिश्रित हरी सब्जिया माइक्रोवेब या कुकर से वाष्पित (स्ट्रीम्ड) सब्जियों का सेवन करे।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी है जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभाति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तामन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।

कंबल या दरी बिछाकर घुटनों के बल लेट जाएं और अपने दाहिने पांव को घुटने से मोड़कर नितंब के नीचे लगा दें। अब बाएं पांव को भी घुटने से मोड़कर, बाएं भुजदण्ड पर रख लें और दोनों हाथों को गर्दन के पीछे ले जाकर परस्पर मिला लें। इस आसन की यही पूर्ण स्थिति है।इस आसन से फेंफड़ों में शक्ति आती है। दमा और क्षय आदि रोगों को यह शांत करता है। साथ ही हाथ-पांवों में लचीलापन और दृढ़ता लाकर उन्हें मजबूत बनाता है। यह आसन लड़के और लड़कियों के लिए बेहद फायदेमंद है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल जो प्राकृतिक चिकित्सा से बनाया गया है उसे लगभग 25 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्राल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।

शरीर शोधन में कफ के निवारण के लिए वमन (उल्टी) लाभप्रद उपाय है। श्वास के रोगी को आमाशय, आतों और फेफड़ों के शुद्धीकरण के लिए ‘अमलतास’ का विरेचन विशेष लाभप्रद है। इसके लिए 250 मि.ली. पानी में 5 से 10 ग्राम अमलतास का गूदा उबालें। चौथाई शेष रहने पर छानकर रात को सोते समय दमा पीड़ित शख्स को चाय की तरह पिला दें।हमेशा खुश रहें , खिलखिलाकर हंसें और अपनी जीवनशैली संयमित रखें।


अस्थमा के लिए उचित आहार :-


जो लोग आस्थमा जैसी बीमारी से लड़ रहे हैं, उनके लिए सबसे ज़रूरी है खाने में एण्टी आक्सिडेंट का इस्तेमाल। एण्टी आक्सिडेंट सीधा फेफड़ों में जाकर फेफड़ों की बीमारियों से और सांसों की बीमारियों से लड़ते हैं। वो खाद्य पदार्थ जिनमें विटामिन सी और ई होते है वो हर प्रकार की सूजन कम करते हैं।

साइट्रस फूड जैसे संतरे का जूस, हरी गोभी में विटामिन सी की मात्रा अधिक पायी जाती हैं और यह अस्‍थमा के मरीज़ों के लिये  अच्‍छे होते हैं।  ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमे विटामिन ए की मात्रा अधिक होती है वो फेफड़ों से एलर्जेन निकालने में बहुत उपयोगी होते हैं।

ऐसे फल व सब्ज़ियां जो गहरे रंग की होती हैं उनमें बीटा कैरोटिन की मात्रा बहुत अधिक होती है जैसे गाज़र, गहरे हरे रंग की सब्ज़ियां पालक आदि। फल व सब्ज़ियों का रंग जितना गहरा होता है उनमें एण्टीआक्सिडेंट की मात्रा उतनी ही अधिक होती है।

विटामिन ई का उपयोग ज़्यादातर खाना बनाने के तेल में होता है। लेकिन अस्थमा के मरीज़ को इसका उपयोग कम कर देना चाहिए।  विटामिन ई गेहूं, पास्ता और ब्रेड में भी पाया जाता है लेकिन इन आहार में विटामिन की मात्रा कम होती है।

ऐसे खाद्य पदार्थ जिनमें विटामिन बी की मात्रा ज़्यादा होती है जैसे दाल और हरी सब्ज़ियां, वो अस्थमैटिक्स को अटैक से बचाती हैं। ऐसा भी पाया गया है कि अस्थमैटिक्स में नायसिन और विटामिन बी 6 की कमी होती है।

कच्चे प्याज़ में सल्फर की मात्रा बहुत ज़्यादा होती है जिससे कि आस्थमा के मरीजों को बहुत लाभ मिलता है।

ओमेगा 3 फैटी एसिड फेफड़ों में हुई सूजन को कम करने के साथ बार बार हो रहे आस्थमा अटैक से भी बचाने में मदद करता है। ओमेगा 3 फैटी एसिड मछलियों में पाया जाता है।  सेलेनियम भी फेफड़ों में हुई सूजन को कम करने में उपयोगी होता है। अगर सेलेनियम के साथ अस्थमैटिक्स द्वारा विटामिन सी और ई भी लिया जा रहा है तो प्रभाव दोगुना हो जाता है। सेलेनियम सी फूड, चिकेन और मीट में भी पाया जाता है।

वो खाद्य पदार्थ जिनमें कि मैगनिशीयम की मात्रा ज़्यादा होती है वो श्वास नली से अतिरिक्त हवा को अन्दर आने देते हैं जिससे कि सूजन पैदा करने वाले सेल्स भी कम हो जाते है। मैग्निशीयम की मात्रा पालक, हलिबेट, ओएस्टर में ज़्यादा होती है। कुछ खाने पीने की चीज़ों से श्वासनली में मौजूद म्यूकस बहुत पत्ला और पानी सा हो जाता है जैसे स्पाइसी खाना अदरक, प्याज़ आदि।

फैट युक्त पदार्थ जैसे दूध, बटर से अस्थमा की तीव्रता कम हो जाती है। वो बच्चे जो ज़्यादा फैट युक्त आहार लेते है उनकी तुलना में वो बच्चे जो फैट युक्त आहार कम लेते हैं, उनमें आस्थमा की सम्भावना अधिक होती है।  आस्थमा अटैक के समय कॉफी  बहुत ही फायदेमंद सिद्ध हो सकती है क्योंकि कैफीन थियोफाइलिन से बहुत ही मिलता जुलता है और थियोफाइलिन का इस्तेमाल कई दवाओं में होता है, जिससे कि सांस लेने में मदद मिलती है। लेकिन वो लोग जो थियोफाइलिन ले रहे है उन्हें कैफीन युक्त चाय, काफी या कोल्ड ड्रिंक नहीं लेना चाहिए क्योंकि थियोफाइलिन और कैफीन मिलकर टाक्सिक हो सकते हैं। अगर आपके अटैक का कारण चिन्ता है तो आप ज़्यादा मात्रा में कैफीन ले सकते हैं।

अस्थमा के रोगी को शीतल खाद्य पदार्थो और शीतल पेयों का सेवन नहीं करना चाहिए। उष्ण मिर्च-मसाले व अम्लीय रस से बने खाद्य पदार्थो का सेवन न करें। भोजन में अरबी, कचालू, रतालू, फूलगोभी आदि का सेवन न करें। अस्थमा के रोगी को केले नहीं खाने चाहिए। उड़द की दाल से बने खाद्य पदार्थो का सेवन नहीं करना चाहिए। अस्थमा के रोगी को दही और चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।

समुद्री मछली, सैल्मन, ट्यूना और कॉड लिवर इत्यादि को मिलाकर ही फिश ऑयल और फिश के अन्य उत्पादों का निर्माण किया जाता है। फिश ऑयल में ओमेगा 3 फैटी एसिड होता है जो कि बहुत जल्दी अस्‍थमा रोगियों को ठीक करने में कारगार है। यानी यदि अस्थमा रोगी फिश ऑयल का सेवन करते हैं तो ये उनके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक है। इससे गले में आने वाली सूजन से निजात मिलती हैं। जो बच्चे श्वास दमा (bronchial asthma) के शिकार होते हैं उनके लिए फिश ऑयल का सेवन बहुत फायदेमंद है। अस्थमा रोगियों के लिए रोजाना तीन ग्राम फिश ऑयल लेना उनके अस्थमा की समस्याओं को दूर कर सकता है। लेकिन यदि इससे अधिक फिश ऑयल लिया जाता है तो सांस संबंधी विकार, दस्त की समस्या और नाक से खून बहना इत्यादि की समस्या हो सकती है। अस्थमा के दौरान आराम पाने के लिए फिश ऑयल के बदले दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए। अस्थमा से निजात पाने के लिए फिश ऑयल का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर से जरूर सलाह लेनी चाहिए। अस्थमा के अलावा फिश ऑयल से दिल की बीमारियां, अलजाइमर रोग, अर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों को भी कम किया जा सकता है।

मछली के नियमित सेवन से आप कई बीमारियों से निजात पा सकते हैं। जब बात हो अस्थमा की तो अस्थमैटिक मरीजों को अस्थमा से जुड़ी समस्याओं से निजात पाने के लिए निश्चित रूप से मछली का सेवन करना चाहिए। फैटी फिश अस्थमा रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद होती है। अस्थमा के मरीजों को सप्ताह में कम से कम दो बार मछली का सेवन जरूर करना चाहिए। इससे ना सिर्फ वे आसानी से सांस ले सकते हैं बल्कि उनके गले की सूजन, खराश, संकरी श्‍वासनली इत्यादि में भी सुधार होता है। क्या आप जानते हैं जो अस्थमैटिक मरीज सप्ताह में दो बार मछली का सेवन करते हैं, ऐसे मरीजों में लगभग 90 फीसदी अस्थमा की समस्याएं कम हो जाती हैं।


अस्थमा को नियन्त्रित करने के कुछ उपाय इस प्रकार हैं :-



तुलसी के पत्तों को अच्छी तरह से साफ कर उनमें पिसी काली मिर्च डालकर खाने के साथ देने से दमा नियंत्रण में रहता है।

दमे का दौरा बार-बार न पड़े इसके लिए हल्दी और शहद मिलाकर चांटना चाहिए।

तुलसी दमे को नियंत्रि‍त करने में लाभकरी है। तुलसी को पानी के साथ पीसकर उसमें शहद डालकर चाटने से दमे से राहत मिलती है।

दमे आमतौर पर एलर्जी के कारण भी होता है। ऐसे में एलर्जी को नियंत्रि‍त करने के लिए दूध में हल्दी डालकर पीनी चाहिए।

शहद की गंध को दमे रोगी को सुधांने से भी आराम मिलता है।

नींबू पानी दमे के दौरे को नियंत्रि‍त करता है। खाने के साथ प्रतिदिन दमे रोगी को नींबू पानी देना चाहिए।

आंवला खाना भी ऐसे में अच्छा रहता है। आंवले को शहद के साथ खाना तो और भी अच्छा है।

गर्म पानी में अजवाइन डालकर स्टीम लेने से भी दमे को नियंत्रि‍त करने में राहत मिलती है।

अस्थमा रोगी को लहसून की चाय या फिर दूध में लहसून उबालकर पीना भी लाभदायक है।

सरसों के तेल को गर्म कर छाती पर मालिश करने से दमे के दौरे के दौरान आराम मिलता है।

मेथी के बीजों को पानी में पकाकर पानी जब काढ़ा बन जाए तो उसे पीना दमें में लाभकारी होता है।

लौंग को गर्म पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर उसमें शहद डालकर पीने से दमे को नियंत्रि‍त करने में आसानी होती है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को नारियल पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।

तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिलाकर पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है। दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी को भिगोकर खायें तथा इसका पाने में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिए तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं।

1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए। लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है।

अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चाय का सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।

दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदे मंद होता है। 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है।

180 मिमी पानी में मुट्ठीभर सहजन की पत्तियां मिलाकर करीब 5 मिनट तक उबालें। मिश्रण को ठंडा होने दें, उसमें चुटकीभर नमक, कालीमिर्च और नीबू रस भी मिलाया जा सकता है। इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है।

अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है। मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक कप पानी उबालें। हर रोज सबेरे-शाम इस मिश्रण का सेवन करने से निश्चित लाभ मिलता है।

लहसुन भी दमा के इलाज में काफी कारगर साबित होता है ३० मि.ली.दूध में लहसुन की ५ कलियाँ उबालें और इस मिश्रण को हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है अदरख की गर्म चाय में लहसुन की दो पिसी कलियाँ मिलाकर पिने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है सुबह-शाम इस चाय के सेवन करने से मरीज को फायदा होता है ।

दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें यह घरेलु उपाय काफी फायदेमंद रहता है ।

4-5 लौंग लें और 125 मि.ली.पानी में 5 मिनट तक उबालें इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलें और गर्म-गर्म पि लें हर रोज दो -तीन बार यह काढ़ा बनाकर पिने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है ।

दमे को नियंत्रित रखने के लिए शहद और तुलसी की पत्तियों का पीसकर मिश्रण तैयार करें और प्रतिदिन सुबह सुबह इसका सेवन करें  यदि आपको एलर्जी पैदा करने वाला तत्व अपने आसपास नजर आए और आपको लगे की दमा भड़क सकता है तो इसे में तत्काल तुलसी की पत्तियों में सेंधा नमक मिलाकर सेवन करे ।

श्वसन मार्ग को स्वच्छ रखने के लिए दूध के साथ भुने चनों का प्रयोग करें ।

एक चम्मच शहद हल्दी का चूर्ण मिलाकर सेवन करना भी अस्थमा का एक और बेहद कारगर घरेलु उपचार है । अस्थमा से तत्काल अस्थाई राहत पाने के लिए काली मिर्च में तुलसी की पत्तियां मिलाकर सेवन करे ।

प्रति दिन एक गिलास दूध में हल्दी चूर्ण मिलाकर पीने से भी लाभ मिलता है खली पेट हल्दी दूध पीने से ज्यादा फायदा होता है जिन तत्वों से दमा भड़कने की आशंका हो या साँस लेने में तकलीफ बढ़ती हो उससे बचने की कोशिश करे अस्थमा के मरीज को नियमित रूप से अलग-अलग किस्म की दालों और सूखे अंगूरों का सेवन करना चाहिए ताकि यह रोग दूर रहे तली भुनी सामग्री का सेवन न करे और रात के समय मरीज को हल्का भोजन करने से भी फायदा मिलता है ।

शहद एक सबसे आम घरेलू उपचार है, जो कि अस्‍थमा के इलाज के लिये प्रयोग होती है। अस्‍थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से जल्‍द राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्‍लास पानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी से राहत मिलती है। शहद बलगम को ठीक करता है, जो अस्‍थमा की परेशानी पैदा करता है।

एक कप घिसी हुई मूली में एच चम्‍मच शहद और नींबू का रस मिला कर 20 मिनट तक पकाएं। इस मिश्रण को हर रोज एक चम्‍मच खाएं। यह इलाज बड़ा ही प्रसिद्ध और असरदार है।

रातभर एक गरम पानी वाले ग्‍लास में सूखी अंजीर को भिगो कर रख दें। सुबह होते ही इसे खाली पेट खाएं। ऐसा करने से बलगम भी ठीक होता है और संक्रमण से भी राहत मिलती है।

करेला, जो कि अस्‍थमा का असरदार इलाज है, उसके एक चम्‍मच पेस्‍ट को लेकर शहद और तुलसी के पत्‍ते के रस के साथ मिला कर खाएं। इससे अंदर की एलर्जी से बहुत राहत मिलती है।

अंदर की एलर्जी को सही करने के लिये मेथी भी बहुत असरदार होती है। एक ग्‍लास पानी के साथ मेथी के कुछ दानों को तब तक उबालें, जब तक पानी एक तिहाई न हो जाए। अब उसी पानी में शहद और अदरक का रस मिला लें। इस रस को दिन में एक बार पीने से जरुर राहत मिलेगी।

10 ग्राम सरसों का तेल और 10 ग्राम गुड़ को हल्का गुनगुना कर प्रतिदिन सुबह लें। इस नुस्खे को 21 से 40 दिनों तक प्रयोग करें।

एक चम्मच अदरक का रस + एक चम्मच तुलसी का रस+ एक चम्मच शहद सुबह-शाम लें।

शुद्ध आवलासार गधक 2 ग्राम + 2 ग्राम कालीमिर्च पीसकर, 10 ग्राम गाय के घी में मिलाकर चाटें। प्रतिदिन सुबह एक बार 15 दिनों तक।

मदार या आक का एक पत्ता + 25 दाने कालीमिर्च ठीक से पीसकर 250 मि.ग्रा. की गोलिया बना लें। 1 से 2 गोली शहद से प्रतिदिन लें।

कालीमिर्च, छोटी पीपल और भुना सुहागा समान मात्रा में लेकर, पीसकर, छानकर रखें। इस चूर्ण को 2 से 4 ग्राम मात्रा में सुबह-शाम शहद से सेवन करें।

अनार के दानों को कूट-पीसकर चूर्ण बनाकर, 3 ग्राम चूर्ण मधु के साथ दिन में दो बार सेवन करें।

खजूर की गुठली निकालकर, सोंठ के चूर्ण के साथ पान में रखकर खांए।

अस्थमा में श्वास अवरोध होने पर कॉफी पिएं।

कोष्ठबद्धता के कारण रोगी को बहुत परेशानी होती है। कोष्ठबद्धता को नष्ट करने के लिए रात्रि को एरंड का तेल 5 ग्राम मात्रा में दूध या हल्के गर्म जल के साथ सेवन करें।

दूध में दो पीपल उबालकर, छानकर सेवन करें।

सैंधावादि तेल की छाती पर मालिश करने से अस्थमा रोग में बहुत आराम मिलता है।

चौलाई की सब्जी बनाकर खाने से अस्थमा रोगी को बहुत लाभ होता है।

रात को सोने से पहले भुने चने खाकर ऊपर से थोड़ा-सा गरम दूध पीना भी लाभप्रद है।

गाजर का रस सुबह व दोपहर प्रतिदिन पीने से इस रोग से मुक्ति में सहारा मिलता है।

रात को सोने से पूर्व एक दो काली मिर्च लेने से भी आराम पहुंचता है।

एक पका केला छिला लेकर चाकू से लम्बाई में चीरा लगाकर उसमें एक छोटा चम्मच दो ग्राम कपड़छान की हुई काली मिर्च भर दें । फिर उसे बगैर छीले ही, केले के वृक्ष के पत्ते में अच्छी तरह लपेट कर डोरे से बांध कर 2-3 घंटे रख दें । बाद में केले के पत्ते सहित उसे आग में इस प्रकार भूने की उपर का पत्ता जले । ठंडा होने पर केले का छिलका निकालकर केला खा लें ।प्रतिदिन सुबह में केले में काली मिर्च का चूर्ण भरें। और शाम को पकावें ।आप इसे 15-20 दिन करे  खूब लाभ होगा ।

केला के पत्तों को सुखाकर किसी बड़े बर्तन में जला लेवें। फिर कपड़छान कर लें और इस केले के पत्ते की भरम को एक कांच की साफ शीशी या डिब्बे में रख लें । बस, दवा तैयार है । एक साल पुराना गुड़ 3 ग्राम चिकनी सुपारी का आधा से थोड़ा कम वनज को 2-3 चम्मच पानी में भिगों दें । उसमें 1-4 चौथाई दवा केले के पत्ते की राख डाल दें और पांच-दस मिनट बाद ले लें । दिनभर में सिर्फ एक बार ही दवा लेनी है, कभी भी ले लेवें ।

बच्चे का असाध्य दमा - अमलतास का गूदा 15 ग्राम दो कप पानी में डालकर उबालें चौथाई भाग बचने पर छान लें और सोते समय रोगी को गरम-गरम पिला दें । फेफड़ों में जमा हुआ बलगम शौच मार्ग से निकल जाता है । लगातार तीन दिन लेने से जमा हुआ कफ निकल कर फेफड़े साफ हो जाते है । महीने भर लेने से फेफड़े कर तपेदिक ठीक हो सकती है ।

यह करके भी देखें-


सांस की बीमारी (दमा या अस्थमा) एक आम रोग है। वर्तमान समय में अधिकांश लोग इससे पीडि़त हैं। आमतौर पर यह रोग अनुवांशिक होता है तो कुछ लोगों को मौसम के कारण हो जाता है। इसके कारण रोगी कोई भी काम ठीक से नहीं कर पाते और जल्दी थक जाते हैं। मेडिकल साइंस द्वारा इस रोग का संपूर्ण उपचार संभव है। साथ ही यदि नीचे लिखे उपायों को भी किया जाए तो इस रोग में जल्दी आराम मिलता है।

शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से लगातार तीन सोमवार तक एक सफेद रूमाल में मिश्री एवं चांदी का एक चौकोर टुकड़ा बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें तथा शिवजी को चावल के आटे का दीपक कपूर मिश्रित घी के साथ अर्पित करें। श्वास रोग दूर हो जाएंगे।

रविवार को एक बर्तन में जल भरकर उसमें चांदी की अंगूठी डालकर सोमवार को खाली पेट उस जल का सेवन करें। दमा रोग दूर हो जाएगा।

किसी भी मास के प्रथम सोमवार को विधि-विधानपूर्वक चमेली की जड़ को अभिमंत्रित करके सफेद रेशमी धागे में बांधकर गले में धारण करें और प्रत्येक सोमवार को बार-बार आइने में अपना चेहरा देंखे। सांस की सभी बीमारियां दूर हो जाएंगी।

सांस की नली में सूजन, सांस लेने में तकलीफ, फेफड़ों में सूजन के कारण कफ जमने अथवा खांसी से मुक्ति पाने के लिए किसी शुभ समय में केसर की स्याही और तुलसी की कलम द्वारा भोजपत्र पर चंद्र यंत्र का निर्माण करवाकर गले में धारण करें। श्वास संबंधी सभी रोग दूर हो जाएंगे।

रविवार के दिन सुबह छोटी दूधी लाकर, उसमें से 6 ग्राम और 3 ग्राम सफेद जीरा लेते हैं। दोनों को बारीक पीसकर पानी में घोलकर पी लेते हैं। इस दिन केवल दही में इच्छानुसार चिवड़ा भिगोंकर इच्छानुसार खाना चाहिए। अगले दिन सोमवार को दवा का सेवन न करें। मंगलवार को फिर उसी दवा का सेवन करें तथा दिन भर भोजन में दही चिवड़ा ही खाएं। इसके बाद अगले दिन यानी बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार को दवा का सेवन न करें। फिर रविवार को दवा का सेवन करें तथा दिन भर भोजन में दही चिवड़ा ही खाएं इस प्रकार दवा का कोर्स पूरा करने पर पुराने से पुराना दमा नष्ट हो जाता है।

विशेष सावधानी :- रोगी को किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।


अस्थमा का मछली से इलाज:-



हैदराबाद में मछली के जरिए किया जाने वाला इलाज लोगों में काफी मशहूर है। ऐसी मान्यता है कि करीब 150 साल पहले वीरन्ना गौड़ नाम के एक व्यक्ति थे, जो दूसरों की हमेशा मदद किया करते थे। अचानक एक दिन उनसे एक दैवीय व्यक्ति मिले। प्रसन्न होकर उन्होंने इलाज का यह सीक्रेट फॉर्म्युला बताया और कहा कि इससे लोगों का मुफ्त इलाज करना। तब से लेकर आज तक बेथानी गौड़ परिवार इस फॉर्म्युला से लोगों का मुफ्त इलाज करता आ रहा हैं। हर साल मॉनसून की शुरूआत होते ही जून महीने में हैदराबाद की बेथियानी गौड़ फैमिली के पास दुनिया भर से हजारों लोग इस तरीके से अस्थमा का इलाज कराने आते हैं।


कैसे होता है इलाज:-



सबसे पहले बैथिनी मछली से बनी दवा को जिंदा मुरेल मछली के मुंह में रखा जाता है और उस मछली को मरीज के मुंह में डाल दिया जाता है। दो से सवा दो इंच लंबाई की यह मछली काफी चिकनी होती है, इसलिए मुह में आसानी से स्लिप हो जाती है और मरीज भी इसे आराम से निगल लेता है। शरीर के अंदर यह 15 मिनट तक जिंदा रहती है। यह मछली गले से लेकर पेट तक जाती है। उस दौरान उसकी पूंछ और पंख फड़फड़ाने से सांस लेने का पूरा सिस्टम साफ हो जाता है। बताते हैं कि अगर इस तरीके से तीन साल तक इलाज कराएं और 45 दिनों तक उनके अनुसार डाइट लेते रहें तो अस्थमा 100 फीसदी तक ठीक हो जाता है। यह दवा मृगशिरा कार्तिक नक्षत्र यानी जून के पहले सप्ताह के आस-पास दी जाती है।

नोट- 


जब आज से पांच साल पहले जब हम हैदराबाद रहते थे वहां पांच साल  रहा हमने भी कई लोगो से पता किया तो पता चला कि ये सही है फिर एक बार हम देखने गए और बड़ी भीड़ होती है वहां का प्रसाशन भी काफी सुरक्षा व्यवस्था में लगता है - इसकी एक अलग ही पोस्ट है चित्रों सहित आपके लिए नीचे इसका लिंक दे रहा हूँ-


लिंक -http://www.upcharaurprayog.com/2015/02/blog-post_92.html

हठ योग क्या है- What is Hatha Yoga

आपने 'हठ योग' का नाम तो सुना ही होगा और ऐसा अनुमान भी लगाया होगा कि जो योग जबरदस्ती व बलपूर्वक किया जाए उसे हठयोग कहते हैं-




यह गलत धारणा है। 'हठ' शब्द का प्रयोग जबरदस्ती के लिए अवश्य होता है, किन्तु जब 'हठ' के साथ 'योग' जुड़ जाए, तो वह एक आध्यात्मिक अर्थ ग्रहण कर लेता है। 'हठ' शब्द दो अक्षरों से मिलकर बना है। 'ह' हकार अर्थात् दायां नासिका स्वर, जिसे पिंगला नाड़ी भी कहते हैं और 'ठ' ठकार अर्थात् बायां नासिका स्वर, जिसे इड़ा नाड़ी कहते हैं। इन दोनों स्वरों की योग से संधि 'हठयोग' कहलाती है। इस प्रकार 'हठ' और 'योग' की संधि से मध्य स्वर या सुषुमन नाड़ी में प्राण का आवागमन होकर कुंडलिनी शक्ति व चक्रों का जागरण होता है। इससे शरीर में स्थित अनंत रहस्य खुल जाते हैं और साधक अध्यात्म मार्ग पर बढ़ता जाता है।


हठ योग साधना शरीर, इन्द्रियों, मन व प्राण को स्वस्थ बनाए रखने की एक वैज्ञानिक पद्धति है। इसके निरंतर अभ्यास से शरीर की प्राण ऊर्जा का विकास होता है, जिससे साधक बीमारियों से बचा रहता है। वैसे तो हठयोग साधना का वर्णन अनेक ग्रंथों में किया गया है, लेकिन इसका सबसे विस्तृत वर्णन हठयोग प्रदीपिका और घेरण्ड संहिता में मिलता है। घेरण्ड संहिता में हठयोग की साधना के सात अंगों का वर्णन किया गया है। इन्हें हठ योग के सप्तांग भी कहा जाता है, जो इस प्रकार हैं- षट्कर्म, आसन, मुदा, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान और समाधि। यहां फिलहाल षट्कर्म पर विस्तार से चर्चा की जा रही है।

जाने क्या है हठयोग :-



षट्कर्म:-





हठ योग की साधना में षट्कर्म का प्रमुख स्थान है। साधना के लिए जिस शुद्धि एवं आरोग्यता की आवश्यकता होती है, वह षट्कर्मों के द्वारा ही सम्भव है। षट्कर्म शरीर में स्थित विजातीय तत्वों, दूषित पदार्थों और मल को बाहर निकाल कर शरीर व मन को हल्का व निरोगी बना देते हैं। इनके माध्यम से बीमारियों का जड़ से निवारण किया जाता है। वात, पित्त और कफ की विषमता हो जाए, तो इनके अभ्यास से उन्हें संतुलित किया जा सकता है।


षट्कर्म में शरीर-शोधन के छह साधन बताए गए हैं- धौति, बस्ति, नेति, नौलि, त्राटक और कपालभाति।


धौति में मुंह को कौवे की चोंच की भांति बनाकर अर्थात् दोनों होंठों को सिकोड़कर धीरे-धीरे हवा को पानी की भांति पीकर पेट में ले जाएं, फिर वहां चारों ओर घुमाएं। इसके बाद नासिकारन्ध्रों से हवा को धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। यही वातसार धौति कहलाती है। यह क्रिया पेट के रोगों को नष्ट कर आंतों को ताकत प्रदान करती है। इससे भूख भी बढ़ती है।इस तरह तैयार किए गए पानी में से एक या दो गिलास पानी कागासन या उत्कटासन में बैठकर पीएं। इसके बाद पांच आसनों- ताड़ासन, ऊर्ध्वहस्तोत्तानासन, कटिचक्रासन, तिर्यक भुजंगासन व उदराकर्षणासन का अभ्यास करें। एक आसन कम से कम 5-6 बार दोहराएं। संपूर्ण क्रिया इसी प्रकार दो बार करने के बाद फिर एक-दो गिलास पानी पीएं।


बस्ति के दो प्रकार हैं- जल बस्ति और स्थल बस्ति।

(क) जल बस्ति- किसी बड़े बर्तन में नाभि तक पानी भरकर या नदी, तालाब आदि के बहते पानी में उत्कटासन की मुद्रा में बैठ जाएं। गुदा का आकुंचन करके जल अंदर की ओर प्रविष्ट कराएं। इससे पानी बड़ी आंत के अन्दर जाकर, वहां जमा मल को बाहर निकालेगा। इसके बाद उस दूषित पानी को भी गुदा मार्ग से बाहर निकाल दें। यह क्रिया जल बस्ति कहलाती है। इसके अभ्यास से प्रमेह, उदावर्तरोग, कुपित वायु आदि रोगों में लाभ मिलता है। गुल्म, प्लीहा, उदर और वात, पित्त, कफ संबंधी रोग नष्ट होते हैं।

(ख) स्थल बस्ति (पवन बस्ति)- जमीन पर पश्चिमोत्तान होकर लेट जाएं। इसके बाद अश्विनी मुद्रा में धीरे-धीरे गुदामार्ग का आकुंचन और प्रसारण करें। ऐसा करने से वायु गुदा मार्ग से भीतर जाएगी और फिर वह वायु बाहर निकल जाएगी। यह क्रिया पवन बस्ति कहलाती है। इसके अभ्यास से आमवात आदि रोगों में लाभ मिलता है। उदरस्थ विकारों की निवृत्ति होती है और भूख बढ़ती है।


नेतिकर्म के दो भेद हैं- सूत्र नेति और जल नेति।

(क) सूत्र नेति: घेरण्ड संहिता के अनुसार प्रात:काल खाली पेट यह क्रिया करनी चाहिए। इसके लिए सूत का विशेष तरीके से बुना हुआ बालिश्त भर से थोड़ा ज्यादा लंबा सूत्र लें। जो स्वर चल रहा हो, उस नासारन्ध्र में यह सूत्र विधिपूर्वक डालकर मुंह से निकालना नेतिकर्म कहलाता है। हठयोगप्रदीपिका अनुसार स्निग्ध सूत्र को नासिकारन्ध्र में प्रविष्ट करके मुंह से निकालना नेति कर्म है।

(ख) जल नेति: यह क्रिया प्रात:काल की जाती है। जल नेति के लिए बना विशेष टोंटीदार लोटा लें। उसमें गुनगुना पानी भर लें व थोड़ा नमक डाल लें। अब कागासन में बैठ कर, जो स्वर चल रहा है, उसी नासिकारन्ध्र में टोंटी का मुंह लगा कर गर्दन को थोड़ा झुकाएं व मुंह से सांस लेते व निकालते रहें। ऐसा करने से दूसरे नासारन्ध्र से पानी बाहर निकलना शुरू हो जाएगा। यही क्रिया इसी प्रकार दूसरे नासारन्ध्र से भी कर लें।

नौलि कर्म:-




प्रात:काल खाली पेट शौचादि के बाद दोनों पैरों को थोड़ा खोलकर खड़े हो जाएं व घुटनों को मोड़ें और जंघाओं पर हाथ रख लें। इसके बाद सांस को पूरा बाहर निकाल कर पेट को अन्दर की ओर सिकोड़ें तथा हाथों पर थोड़ा जोर डालते हुए पेट की मध्य पेशियों को बाहर की ओर निकालें। फिर उन्हें हाथों के सहारे से दायें से बायें व बायें से दायें घुमाएं। यह नौलि कर्म अथवा नौलि संचालन कहलाता है। इससे पेट की बीमारियों की रोकथाम में सहायता मिलती है व जठराग्नि प्रदीप्त होती है।


त्राटक:-




त्राटक शब्द 'त्रि' के साथ 'टकी बंधने' की संधि से बना है। वस्तुत: शुद्ध शब्द त्र्याटक है, जिसकी व्युत्पत्ति है 'त्रिवारं आसमन्तात् टंकयति इति त्राटकम्'। अर्थात् जब साधक किसी वस्तु पर अपनी दृष्टि और मन को बांधता है, तो वह क्रिया त्र्याटक कहलाती है। त्र्याटक शब्द ही आगे चलकर त्राटक हो गया। किसी वस्तु को जब हम एक बार देखते हैं, तो यह देखने की क्रिया एकटक कहलाती है। उसी वस्तु को जब हम कुछ देर तक देखते हैं, तो द्वाटक कहलाती है। किन्तु जब हम किसी वस्तु को निनिर्मेष दृष्टि से निरंतर दीर्घकाल तक देखते रहते हैं, तो यह क्रिया त्र्याटक या त्राटक कहलाती है। दृष्टि की शक्ति को जाग्रत करने के लिए हठयोग में इस क्रिया का वर्णन किया गया है।

कपालभाति:-




मस्तिष्क के सामने के भाग को 'कपाल' कहते हैं। 'भाति' का अर्थ है प्रकाशित करना या चमकाना। मस्तिष्क के सारे विकारों को नष्ट करने के लिए लोहार की धौंकनी की तरह तेजी से प्राण वायु का बार-बार रेचक करना ही कपालभाति है। इसमें सांस हर बार स्वयं ही अन्दर जाती है। घेरण्ड संहिता में कपालभाति के तीन भेद बताए गए हैं - वातक्रम, व्युत्क्रम और शीत्कर्म।

(क) वातक्रम कपालभाति: सीधे बैठकर हाथ की प्राणायाम मुदा बनाकर दायें नासिकारन्ध्र को बन्द करके पहले बायें नासिकारन्ध्र से रेचक करें। इसके बाद जल्दी से बायें नासिकारन्ध्र से पूरक करके बिना कुम्भक किए दायें नासिकारन्ध्र से रेचक करें। फिर दायें नासिकारन्ध्र से पूरक करके बायें से रेचक करें। इसी क्रिया को बार-बार बलपूर्वक करना वातक्रम कपालभाति कहलाता है। इसके अभ्यास से कफ संबंधी दोष दूर होते हैं।

(ख) व्युत्क्रम कपालभाति: नासिकारन्ध्रों से गुनगुने पानी को पीकर मुंह से बाहर निकालना व्युत्क्रम कपालभाति कहलाता है। इसके अभ्यास से कफ रोगों में लाभ मिलता है।

(ग) शीत्कर्म कपालभाति: मुंह से सीत्कार की आवाज करते हुए पानी भरकर नासिकारन्ध्रों से निकालना शीत्कर्म कपालभाति कहलाता है। इसके अभ्यास से साधक का शरीर सुंदर हो जाता है। कफ के समस्त दोष दूर होने लगते हैं और बुढ़ापा जल्दी नहीं आता।

उपचार और प्रयोग- http://www.upcharaurprayog.com

Monday, February 16, 2015

अस्थमा के इलाज को हजारों लोग आते है -

क्या आप सोच सकते हैं कि जिंदा मछली को निगलने से अस्थमा ठीक किया जा सकता है। हैदराबाद के बाधिनी गौड़ परिवार की मानें तो हां, बशर्ते मछली के मुंह में जड़ी-बूटियों से तैयार दवा भरी हो। तस्वीरों में देखें कैसे करता है बांधिनी गौड़ परिवार अस्थमा का इलाज।ये परिवार दशकों से अस्थमा मरीजों को ये दवा दे रहा है और हजारों लोग न सिर्फ देश से बल्कि विदेश से भी जिंदा मछली निगलने वाला ये इलाज कराने इस परिवार के पास आ रहे हैं -




आंध्र प्रदेश में हर वर्ष हज़ारों लोग 'मछली इलाज' कहे जाने वाले इस उपचार के लिए आते हैं और इसकी लोकप्रियता पिछले कुछ वर्षों में घटने के बदले बढ़ी है. दमा के रोगी को एक जीवित मछली निगलनी होती है जिसके भीतर दमा की दवाई होती है और हर वर्ष लगभग पाँच लाख लोग जून के महीने में इस उपचार के लिए हैदराबाद आते हैं-


मछली के ज़रिए दी जाने वाली इस दवा पर हैदराबाद के गौड़ परिवार का एकाधिकार है, उनका कहना है कि यह प्राकृतिक औषधि है जो उनके परदादा को हिमालय के एक तपस्वी ने 1854 में दी थी.गौड़ परिवार के एक सदस्य बठिनी हरिनाथ कहते हैं कि उनका परिवार पिछले 150 वर्षों से यह दवा लोगों को मुफ़्त में देता रहा है.
गौड़ परिवार का कहना है कि वे इस दवा का फ़ार्मूला नहीं बता सकते क्योंकि ऐसा करने से उसकी 'शक्ति चली जाएगी' और दूसरे लोग इसे अपना धंधा बना लेंगे.



दमा रोग के इलाज के लिए यह दवा साल में केवल एक दिन मृगशिरा कार्तिक के दिन ही दी जाती है। मृगशिरा कार्तिक 5 से 9 जून तक किसी भी दिन होती है और हैदराबाद में मानसून के आने की निर्धारित तारीख़ 5 जून है। दवा देने का यह सिलसिला 150 सालों से चला आ रहा है। हैदराबाद के पुराने शहर में चारमीनार से कुछ ही दूरी पर एक स्थान है दूध बाउली।  दूध बाउली में बत्तिनी गौड़ परिवार रहता है। यह ब्राह्मण परिवार है। इसी परिवार में यह दवा तैयार की जाती है और वितरित की जाती है जिसे मछली प्रसाद का वितरण कहते है-




वास्तव में दवाई कुछ जड़ी-बूटियों से तैयार की जाती है। यह कौन सी जड़ी-बूटियाँ है और दवाई कैसे बनाई जाती है यह सब राज़ है और इस परिवार के अलावा इसे कोई नहीं जानता। इस दवा की छोटी-छोटी गोलियाँ बनाई जाती है। इस गोली को छोटी मरल जाति की जीवित मछली के मुख में रखा जाता है फिर इस मछली को रोगी का मुहँ खोलकर उसमें भीतर डाला जाता है फिर रोगी का मुहँ बन्द कर मुँह को थोड़ा पीछे करते है जिससे रोगी मछली को साबुत निगल लें-


यह दवाई लेने के तीन-चार घण्टे पहले से रोगी कुछ नहीं खाता है यानि खाली पेट रहता है। माना जाता है कि मछली रोगी के खाली पेट में चक्कर लगाती है। मछली और उस दवा की रासायनिक क्रियाओं से दमा रोग ठीक होता है। यह दवाई लेने के पन्द्रह दिन बाद तक कुछ फल और सब्जियाँ खाने की मनाही होती है और कुछ विशेष रूप से खाए जाते है। ऐसा लगातार चार साल तक करने पर दमा रोग पूरी तरह से ठीक होता है-


पहले यह दवाई दूध बाउली स्थित घर में ही दी जाती थी। फिर रोगियों की संख्या बढने लगी और मुहल्ले के मैदान में इसे दिया जाने लगा। पर इधर कुछ सालों से रोगियों की संख्या बहुत बढ गई है। देश के कोने-कोने से रोगी आ रहे है। इसीलिए शहर के सबसे बड़े मैदानों जैसे नुमाइश मैदान और निज़ाम काँलेज मैदान में मछली प्रसाद वितरण की व्यवस्था की जा रही है-



मृगशिरा कार्तिक के दिन सुबह तड़के से ही दवाई दी जाती है जो लगातार चौबीस घण्टे और नक्षत्र के आधार पर कुछ घण्टे और भी जारी रहती है। दवाई मुफ़्त दी जाती है पर मछली रोगी को खुद खरीदनी होती है जिसके लिए लगभग 50 काउंटर खोले जाते है। टोकन के अनुसार जब बारी आने वाली होती है तभी मछाली खरीदनी होती है ताकि मछली जीवित रह सके-



राज्य प्रशासन इसमें पूरी मदद करता है। भीड़ नियंत्रण के लिए पुलिस बन्दोबस्त होता है। कई स्वयंसेवी संघटन भी मदद करते है। रोगियों की संख्या बहुत होती है इसीलिए पाँच दिन पहले से ही टोकन जारी किए जाते है। इस तरह बाहर से आए रोगी और साथ आए रिश्तेदारों को लगभग एक सप्ताह तक ठहरना पड़ता है। यह संघठन उनके ठहरने की व्यवस्था करते है। विभिन्न रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों से उनकी सुविधा के लिए राज्य परिवहन विशेष बसें चलाता है। दवाई देने यानि मछली प्रसाद वितरण के स्थान पर पानी और छाँछ वितरण की व्यवस्था भी यह संघठन करते है-

दवाई की रासायनिक जाँच करवाने और इसे अवैध ठहराने की बहुत कोशिश की गई। डाँक्टरों की एसोसिएशन ने इसे अदालत में चुनौती भी दी पर फ़ैसला गौड़ परिवार के हक़ में हुआ और रोगियों की बढती संख्या को देखकर इसे जारी रखने को कहा गया-

महत्वपूर्ण बात ये है कि मछली के मुंह में भरी जाने वाली दवा के बारे में सिर्फ ये परिवार ही जानता है और सिर्फ परिवार की अगली पीढ़ी को ही ये सीक्रेट फॉर्मूला बताया जाता है-


अब एक नई समस्या खड़ी हो रही है। लग रहा है जैसे मरल जाति की मछली की नस्ल समाप्त हो रही है। वैसे मछलियों को प्रजनन के बाद ही मार्किट में भेजा जाता है जिससे नस्ल बढती रहती है। मगर इस दवाई में छोटी मछली का प्रयोग किया जाता है यानि प्रजनन के पहले ही मछली समाप्त हो रही है-


रोगियों की संख्या बढने से मछलियाँ भी हज़ारों की संख्या में प्रयोग में आ रही है।


भीड़ बढ़ने के कारण लोगो को इंतज़ार करना पड़ रहा है -



आप इसे यू ट्यूब पे भी देखे -https://www.youtube.com/watch?v=uLN-g5xf3ZQ

उपचार और प्रयोग -

बच्चे जब गुस्सा करे या आपको बच्चो पे गुस्सा आये तो क्या करे -

हर माता -पिता  की चाहत होती है कि वे अपने बच्चों को बेहतरीन परवरिश दें। वे कोशिश भी करते हैं, फिर भी ज्यादातर पैरंट्स बच्चों के Behaviour और Performance से खुश नहीं होते। उन्हें अक्सर शिकायत करते सुना जा सकता है कि बच्चे ने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया-इसके लिए काफी हद तक पैरंट्स ही जिम्मेदार होते हैं क्योंकि अक्सर किस हालात में क्या कदम उठाना है-यह वे तय ही नहीं कर पाते। किस स्थिति में पैरंट्स को क्या करना चाहिए -




आपका बच्चा स्कूल जाने या पढ़ाई करने से बचे तो आप क्या करते हैं  माता-पिता बच्चे पर गुस्सा करते हैं। मां कहती हैं कि तुमसे बात नहीं करूंगी। पापा कहते हैं कि बाहर खाने खिलाने नहीं ले जाऊंगा, खिलौना खरीदकर नहीं दूंगा। थोड़ा बड़ा बच्चा है तो पैरंट्स उससे कहते हैं कि कंप्यूटर वापस कर, मोबाइल वापस कर। तुम बेकार हो, तुम बेवकूफ हो। अपने भाई-बहन को देखो, वह पढ़ने में कितना अच्छा है और तुम बुद्धू। कभी-कभार थप्पड़ भी मार देते हैं-

वजह को जाने :-



हमें क्या करना चाहिए- हम  वजह जानने की कोशिश करें कि वह पढ़ने से क्यों बच रहा है- कई वजहें हो सकती हैं जैसे कि उसका आईक्यू लेवल (IQ Level ) कम हो सकता है या फिर कोई टीचर नापसंद हो सकता है, वह उस वक्त नहीं बाद में पढ़ना चाहता हो आदि।  बच्चा स्कूल जाने लगे तो उसके साथ बैठकर Discus करें कि कितने दिन स्कूल जाना है, कितनी देर पढ़ना है आदि। इससे बच्चे को clear रहेगा कि उसे स्कूल जाना है। बहाना नहीं चलेगा। उसे यह भी बताएं कि स्कूल में दोस्त मिलेंगे। उनके साथ खेलेंगे।

अगर बच्चा स्कूल से उदास लौटता है तो प्यार से पूछें कि क्या बात है- क्या टीचर ने डांटा या साथियों से लड़ाई हुई। अगर बच्चा बताए कि फलां टीचर या बच्चा परेशान करता है तो उससे कहें कि हम स्कूल जाकर बात करेंगे। स्कूल जाकर बात करें भी लेकिन सीधे टीचर को दोष न दें।  जो बच्चे हाइपरऐक्टिव (Hyper Active ) होते हैं, उन्हें अक्सर टीचर शैतान मानकर Ignore करने लगती हैं। ऐसे में टीचर से रिक्वेस्ट करें कि बच्चे को Activities में शामिल करें और उसे मॉनिटर (Monitor ) जैसी जिम्मेदारी दें। इससे वह जिम्मेदार बनता है।

जिस वक्त वह नहीं पढ़ना चाहता, उस वक्त उसे मजबूर न करें, वरना वह जिद्दी हो जाएगा और पढ़ाई से बचने लगेगा। थोड़ी देर बाद फिर से पढ़ने को कहें।

उसके पास बैठें और उसकी पढ़ाई में खुद को शामिल करें। उससे पूछें कि आज क्लास में क्या हुआ- बच्चा थोड़ा बड़ा है तो आप उससे कह सकते हैं कि तुम मुझे यह चीज सिखाओ क्योंकि यह तुम्हें अच्छी तरह आता है। वह खुश होकर सिखाएगा और साथ ही साथ खुद भी सीखेगा।

छोटे बच्चों को किस्से-कहानियों के रूप में काफी कुछ सिखा सकते हैं। उसे बातों-बातों और खेल-खेल में सिखाएं जैसे किचन में आलू गिनवाएं, बिंदी से डिजाइन बनवाएं आदि। पढ़ाई को थोड़ा दिलचस्प तरीके से पेश करें। हर बच्चे की पसंद-नापसंद होती है। उसकी पसंद के सब्जेक्ट पर ज्यादा फोकस करें। और कभी-कभी उसके फ्रेंड्स को घर बुलाकर उनको साथ पढ़ने बैठाएं। इससे पढ़ाई में उसका मन लगेगा।

उलटा बोले, गालीगलौच करे तो-अक्सर पैरंट्स बुरी तरह रिएक्ट करते हैं। बच्चे को उलटा-सीधा बोलने लगते हैं। उस पर चिल्लाते हैं कि फिर से बोलकर दिखा। कई मांएं तो रोने लगती हैं, बातचीत बंद कर देती हैं या फिर ताने मार देती कि मैं तो बुरी हूं, अब क्यों आए मेरे पास...? यदि बच्चा आप पर चीखे-चिल्लाए तो भी आप उस पर चिल्लाएं नहीं। उस वक्त छोड़ दें, लेकिन खुद को पूरी तरह नॉर्मल भी न दिखाएं, वरना वह सोचेगा कि वह कुछ भी करेगा, आप पर कोई फर्क नहीं पड़ता। बाद में जब उसका गुस्सा शांत हो जाए तो बैठकर बात करें कि इस तरह बात करना आपको बुरा लगा और इससे उसके दोस्त, टीचर सभी उसे बुरा बच्चा मानेंगे।  उसे टाल दें। इसे लेकर बार-बार कुरेदे नहीं। अगर बार-बार बोलेंगे तो उसकी Ego हर्ट होगी। हां, कहानी के जरिए बता सकते हैं कि एक बच्चा था, जो गंदी बातें करता था। सबने उससे दोस्ती खत्म कर ली आदि।

आप बच्चे के सामने गाली या खराब भाषा का इस्तेमाल न करें। वह जो सुनेगा, वही सीखेगा। उसे बताएं कि ऐसी भाषा तो गलत लोग बोलते हैं। उनका Background और Work Culture बिल्कुल अलग है और तुम्हारा बिल्कुल अलग।  पांच-छह साल से बड़ा बच्चा जान-बूझकर पैरंट्स की मानहानि करने और खुद को Powerful दिखाने के लिए बोलता है कि आप अच्छे नहीं हैं। पैरंट्स भी बहुत आसानी से हर्ट हो जाते हैं। इसके बजाय आप कह सकते हैं कि तुम इतने अनलकी हो कि तुम्हारी मां गंदी है। इससे उसका पावरफुल वाला अहसास खत्म होगा।

आपका बच्चा यदि चोरी करे या किसी की चीजें उठा लाए तो पैरंट्स बच्चे को पीटने या डांटने लगते हैं। भाई बहनों के आगे उसे जलील करते हैं कि अपनी चीजें संभालकर रखना क्योंकि यह चोर है। कई बार कहते हैं कि तुम हमारे बच्चे नहीं हो सकते। अगर कोई दूसरा ऐसी शिकायत लाता है तो वे मानने को तैयार नहीं होते कि हमारा बच्चा ऐसा कर सकता है। वे पर्दा डालने की कोशिश करने लगते हैं।  चोरी करने पर सजा जरूर दें, लेकिन सजा मार-पीट के रूप में नहीं बल्कि बच्चे को पसंदीदा प्रोग्राम नहीं देखने देना, उसे आउटिंग पर नहीं ले जाना, खेलने नहीं देना जैसी सजा दे सकते हैं। जो चीज उसे पसंद है, उसे कुछ देर के लिए उससे दूर कर दें।

आप बच्चे का बैग रेग्युलर चेक करें, लेकिन ऐसा उसके सामने न करें। उसमें कोई भी नई चीज नजर आए तो पूछें कि कहां से आई? बच्चा झूठ बोले तो प्यार से पूछें। उसकी बेइज्जती न करें, न ही उसके साथ मारपीट करें। चीज लौटाने को कहें लेकिन पूरी क्लास के सामने माफी न मंगवाएं। बच्चा अगर पांच साल से बड़ा है, तब तो बिल्कुल नहीं। वह क्लास के सामने बोल सकता है कि यह चीज मुझे मिल गई थी।  उसे अकेले में सख्ती से जरूर समझाएं कि उसने गलत किया। चोरी बुरी बात है। अगली बार ऐसा नहीं होना चाहिए।  झूठी पनाह नहीं देनी चाहिए। अगर कोई कहता है कि आपके बच्चे ने चोरी की है तो यह न कहें कि वह ऐसा नहीं कर सकता। इससे उसे शह मिलती है। कहें कि हम अकेले में पूछेंगे। सबके सामने न पूछें लेकिन अकेले में पूरी इंक्वायरी करें।  बच्चे को मोरल एजुकेशन दें। उसे बताएं कि आप कोई चीज उठाकर लाएंगे तो आप टेंशन में रहेंगे कि कोई देख न ले। इस टेंशन से बचने का अच्छा तरीका है कि चोरी न की जाए।

पैरंट्स की जिम्मेदारी है कि वे बच्चे को जरूरत की सारी चीजें उपलब्ध कराएं। इससे उसका झुकाव चोरी की ओर नहीं होगा।

यदि आपका बच्चा झूठ बोले तो अक्सर मारपीट पर उतारू हो जाते हैं। खुद को कोसने लगते हैं कि हमारी तो किस्मत ही खराब है। उन्हें लगता है कि बच्चे ने बहुत बड़ा पाप कर दिया है। उसके दोस्तों को फोन करके पूछते हैं कि सच क्या है-जब दूसरा कोई शिकायत करता है तो बिना सच जाने बच्चे की ढाल बनकर खड़े हो जाते हैं कि हमारा बच्चा ऐसा नहीं कर सकता। वे दूसरों के सामने अपनी ईगो को हर्ट नहीं होने देना चाहते।

तब क्या करना चाहिए  जब आपका बच्चा झूठ बोले तो ओवर-रिएक्ट न करें और सबसे सामने न डांटें। न ही उसे सही-गलत का पाठ पढ़ाएं। इसके बजाय उसे उदाहरण देकर उस काम के नेगेटिव पक्ष बताएं। उदाहरण में खुद को सामने रखें - मसलन, मैं जब छोटा था तो क्लास बंक करता था और घर में झूठ बोलता था लेकिन बाद में मैं पढ़ाई में पीछे रह गया या बाद में ढेर सारा काम करना पड़ता था। साथ ही, झूठ बोलने की टेंशन अलग होती थी। इस तरह से बात करने से वह खुद को कठघरे में खड़ा महसूस नहीं करेगा।  खुद में सच सुनने की हिम्मत पैदा करें। हालात का सामना करें। घर में ऐसा माहौल रखें कि बच्चा बड़ी से बड़ी गलती के बारे में बताने से डरे नहीं। बच्चा झूठ तभी बोलता है, जब उसे मालूम होता है कि सच कोई सुनेगा नहीं। उसके भरोसा दिलाएं कि उसकी गलती माफ हो सकती है।

बच्चा झूठ बोलना मां-बाप से ही सीखता है, जबकि 95 फीसदी मामलों में झूठ बोले बिना काम चल सकता है। उलटी-सीधी जिद करे तो... सीधा फरमान जारी कर देते हैं कि तुम जो मांग रहे हो, वह तुम्हें नहीं मिलेगा जबकि कई बार बच्चे की मांग जायज भी होती है। अगर साथ में कोई और तो अक्सर बिना सोचे-समझे बच्चे की इच्छा पूरी भी कर देते हैं ताकि उनकी बातचीत में दखल न हो या फिर दूसरों के सामने उनकी इमेज खराब न हो।

बच्चे को हमेशा रोकें-टोकें नहीं। हर बात के लिए हां करना गलत है तो न करना भी सही नहीं है। 'डोंट डू दिस, डोंट टू दैट' का रवैया सही नहीं है। जो बात मानने वाली है, उसे मान लेना चाहिए। अगर उसकी कुछ बातें मान ली जाएंगी तो वह जिद कम करेगा। मसलन कभी-कभी खिलौना दिलाना, उसकी पसंद की चीजें खिलाना जैसी बातें मान सकते हैं।

ध्यान रहे कि अगर एक बार इनकार कर दिया तो फिर बच्चे की जिद के सामने झुककर हां न करें। बच्चे को अगर यह मालूम हो कि मां या पापा की 'हां' का मतलब 'हां' और 'ना' का मतलब 'ना' है तो वह जिद नहीं करेगा।

किसी भी मसले पर मां-पापा दोनों की सहमति होनी जरूरी है। ऐसा न हो कि एक इनकार करे और दूसरा उस बात के लिए मान जाए। अगर एक सख्त है और दूसरा नरम है तो बच्चा फायदा उठाता है। जो बात नहीं माननी, उसके लिए बिल्कुल साफ इनकार करें, जोर देकर करें और दोनों मिलकर करें। अगर घर में बाकी लोग हैं तो वे भी बच्चे की तरफदारी न करें।

उसे कमजोर बनकर न दिखाएं, न ही उसके सामने रोएं। इससे बच्चा ब्लैकमेलिंग सीख लेता है और बार-बार इस हथियार का इस्तेमाल करने लगता है।  यह न कहें कि अगर तुम यह काम करोगे तो हम वैसा करेंगे, मसलन अगर तुम होमवर्क पूरा करोगे तो आइसक्रीम खाने चलेंगे। उससे कहें कि पहले होमवर्क पूरा कर लो, फिर आइसक्रीम खाने चलेंगे। इससे उसे पता रहेगा कि अपना काम करना जरूरी है। ऐसे में फिजूल जिद बेकार है।  बहस की बजाय कई बार समझौता कर सकते हैं कि चलो तुम थोड़ी देर कंप्यूटर पर गेम्स खेल लो और फिर थोड़ी देर पढ़ाई कर लेना। इससे बच्चा दुनिया के साथ भी Negotiate करना सीख जाता है। हालांकि ऐसा हर बार न हो, वरना बच्चे में ज्यादा चालाकी आ जाती है।

यह भी देखें कि बच्चा जिद कर रहा है या आप जिद कर रहे हैं क्योंकि कई बार पैरंट्स भी बच्चे की किसी बात को लेकर ईगो इशू बना लेते हैं। यह गलत है।

आपका बच्चा  टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर, गेम्स से चिपका रहे तो कई पैरंट्स सीधे टीवी या कंप्यूटर ऑफ कर देते हैं। कई रिमोट छीनकर अपना सीरियल या न्यूज देखने लगते हैं। इसी तरह कुछ मोबाइल छीनने लगते हैं। कुछ इतने बेपरवाह होते हैं कि ध्यान ही नहीं देते कि बच्चा कितनी देर से टीवी देख रहा है या गेम्स खेल रहा है। कई बार मां अपनी बातचीत या काम में दखलंदाजी से बचने से लिए बच्चों से खुद ही बेवक्त टीवी देखने को कह देती हैं।  बच्चे से रिमोट छीनकर बंद न करें और न ही अपनी पसंद का प्रोग्राम लगाकर देखने बैठ जाएं। अपना टीवी देखना कम करें। अक्सर बच्चे स्कूल से आते हैं तो मां टीवी देखती मिलती है।

बच्चे की पसंद के हर प्रोग्राम में कमी न निकालें कि यह खराब है। उससे पूछें कि वह जो देख रहा है, उससे उसने क्या सीखा और हम भी वह प्रोग्राम देखेंगे।  अखबार देखें और बच्चे के साथ बैठकर तय करें कि वह कितने बजे, कौन-सा प्रोग्राम देखेगा और आप कौन-सा प्रोग्राम देखेंगे। इससे बच्चा सिलेक्टिव हो जाता है।  तब उसके कमरे में टाइम टेबल लगा दें कि वह किस वक्त टीवी देखेगा और कब गेम्स खेलेगा? अगर वह एक दिन ज्यादा देखता है तो निशान लगा दें और अगले दिन कटौती कर दें।

विडियो गेम्स आदि के लिए हफ्ते में कोई खास दिन या वक्त तय करें।  आप खुद भी हर वक्त फोन पर बिजी न रहें, वरना बच्चे से इनकार करना मुश्किल होगा। हां, उसे मोबाइल देते वक्त ही मोबाइल बिल की लिमिट तय करें कि महीने में उसे इतने रुपए का ही मोबाइल खर्च मिलेगा। दूसरों को दिखाने के लिए उसे महंगा फोन न दिलाएं।  उसे बताएं कि ज्यादा लंबी बातचीत से शरीर को क्या नुकसान हो सकते हैं..? इतना वक्त खराब करने से पढ़ाई का नुकसान हो सकता है आदि। इसी तरह बताएं कि चैटिंग करें लेकिन बाद में।

अकेले में बच्चे का मोबाइल अवस्य चेक करें। उसमें गलत एमएमएस नजर आएं या ज्यादातर मेसेज डिलीट मिलें तो कुछ गड़बड़ हो सकती है।  कंप्यूटर ऐसी जगह पर रखें, जहां से उस पर सबकी निगाह पड़ती हो। इससे पता चलता रहेगा कि वह किस वेबसाइट पर क्या कर रहा है। इंटरनेट की हिस्ट्री चेक करें। कंप्यूटर पर बच्चे को फोटोशॉप या पेंट आदि सिखाएं। इससे वह कंप्यूटर का रचनात्मक इस्तेमाल कर सकेगा।  अगर पता लग जाए कि बच्चे में बुरी आदतें पड़ गई हैं तो उसे एकदम डांटें नहीं लेकिन अपने बर्ताव में सख्ती जरूर ले आएं और उसे साफ-साफ बताएं कि आगे से ऐसा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ध्यान रहे कि उसकी गलती का बार-बार जिक्र न करें।  बच्चे की अटेंशन डायवर्ट करें। उसे खेल खिलाने पार्क आदि ले जाएं। उसकी Energy का इस्तेमाल सही दिशा में नहीं होगा, तो वह भटक सकता है।

यदि  घर के कामों में हाथ न बंटाए तो-क्या करते हैं पैरंट्स अक्सर मांएं बच्चों से कहती हैं कि मेरे होते हुए तुम्हें काम करने की क्या जरूरत...? बाद में जब बच्चा काम से जी चुराने लगता है तो उसे कामचोर कहने लगती हैं। कई मांएं लड़के-लड़की में भेद करते हुए कहती हैं कि यह काम लड़के नहीं करते, लड़कियां करती हैं। कई बार मांएं सजा के तौर पर काम कराती हैं, मसलन पढ़ नहीं रहे हो तो चलो सफाई करो, किचन में हेल्प करो आदि। बच्चे को लगातार सलाह भी देती रहती हैं, संभलकर गिर जाएगा, टूट जाएगा।


बच्चे को काम बताएं और बार-बार टोकें नहीं कि गिर जाएगा या तुमसे होगा नहीं। बड़ों से भी चीजें गिर जाती हैं। बार-बार टोकने से बच्चे का आत्मसम्मान और इच्छा दोनों खत्म हो जाती हैं। इसके बजाय उसे प्रोत्साहित करें।

आप बच्चे से पानी मंगवाएं। थोड़ा बड़ा होने पर चाय बनवाएं। सबसे सामने उसकी तारीफ करें कि वह कितनी अच्छी चाय बनाता है। इससे घर के कामों में उसकी दिलचस्पी बनने लगती है क्योंकि आज के वक्त में यह जरूरत बन गई है।  दूसरों के सामने बार-बार शान से यह न कहें कि मैं अपने बच्चे से घर का कोई काम नहीं कराती। इससे उसे लगेगा कि घर का काम नहीं करना शान की बात है।

पीयर प्रेशर में महंगी चीजों की डिमांड करे तो... महंगी चीजें मांगने पर या तो बच्चों को डांट पड़ती है या फिर पैरंट्स बेचारगी दिखाते हैं कि हम तो गरीब हैं। हम तुम्हें दूसरों की तरह महंगी चीजें नहीं दिला सकते। बल्कि बच्चे के सामने बैठकर बातें करें कि आपके पास कितना पैसा है और उसे कहां खर्च करना है। उसके साथ बैठकर प्लानिंग करें कि इस महीने तुम्हें नए कपड़े मिलेंगे और अगले महीने मैं खरीद लूंगा। इससे उसे आपकी कमाई का आइडिया रहेगा।  अक्सर पैरंट्स अपनी कटौती कर बच्चे की सारी इच्छाएं पूरी करते हैं। हर बार ऐसा न करें, वरना उसकी डिमांड बढ़ती जाएगी और वह स्वार्थी हो सकता है। उसके सामने यह न करें कि तुम्हारा वह दोस्त फिजूलखर्च है, वह बड़े बाप का बेटा है आदि।

बच्चों को अपने दोस्तों की बुराई पसंद नहीं आती। कुछ कहना भी है तो घुमाकर अच्छे शब्दों में कहें कि तुम्हारा दोस्त बहुत अच्छा है लेकिन कभी-कभी थोड़ा ज्यादा खर्च कर देता है, जो सही नहीं है।  बच्चे की नींव इस तरह तैयार करें कि उसकी संगत भी अच्छी हो। उसके दोस्तों पर निगाह रखें और उन्हें अपने घर बुलाते रहें। बच्चे को ऐसे बच्चों के साथ ही दोस्ती करने को प्रेरित करें, जिनकी वैल्यू आपके परिवार के साथ मैच करें।


दूसरे बच्चों से मारपीट करे तो-कई पैरंट्स इस बात पर बहुत खुश होते हैं कि उनका बच्चा मार खाकर नहीं आता, बल्कि दूसरे बच्चों को मारकर आता है और वे इसके लिए अपने बच्चे की तारीफ भी करते हैं। दूसरे लोग शिकायत करते हैं तो उलटा पैरंट्स उनसे लड़ने को उतारू हो जाते हैं कि हमारा बच्चा ऐसा नहीं कर सकता। कुछ मांएं कहती हैं कि तुम दूसरे बच्चों को मारोगे तो इंजेक्शन लगवा दूंगी, टीचर से डांट पड़वा दूंगी या झोलीवाला बाबा ले जाएगा। थोड़े दिन बाद बच्चा जान जाता है ये सारी बातें झूठ हैं। तब वह और ज्यादा पीटने लगता है।

अगर घर में बच्चे आपस में लड़ते हैं तो लड़ने दें। आखिर में जब दोनों शिकायत लेकर आएं तो बताएं कि जो भी बड़ा भाई/बहन है, वह खुद आपके आप आकर बात करेगा। दोनों में से किसी का भी पक्ष न लें।  कोई दूसरा शिकायत लेकर आएं तो सुनें। उनसे कह सकते हैं कि मैं बच्चे को समझाऊंगी वैसे, बच्चे तो आपस में लड़ते ही रहते हैं। उनकी बातों में न आएं। इससे लड़ने के बावजूद बच्चों में दोस्ती बनी रहती है।  बच्चे को सामने बिठाकर समझाएं कि अगर आप मारपीट करोगे तो कोई आपसे बात नहीं करेगा। कोई आपसे दोस्ती नहीं करेगा। आप उसे गलती के नतीजे बताएं।  इसके लिए उसे सजा जरूर दें, लेकिन सजा मारपीट या डांट के बजाय दूसरी तरह से दी जाए जैसे कि मां आपसे दो घंटे बात नहीं करेंगी या पसंद का खाना नहीं मिलेगा आदि।

हेल्थी खाने से बचे तो... अक्सर मां को लगता है मेरा बच्चा तो कुछ खाता ही नहीं है। वह जबरन उसे खिलाने की कोशिश करती है। अगर वह हेल्दी खाना नहीं खाना चाहता तो मां उसे मैगी, पिज्जा, बर्गर आदि खिला देती है। उसे लगता है कि इस बहाने वह कुछ तो खाएगा। कई पैरंट्स खुद खूब फास्ट फूड खाते हैं या इनाम के तौर पर बच्चे को बार-बार फास्ट फूड की ट्रीट देते हैं। बल्कि आप बच्चे के साथ बैठकर हफ्ते भर का घर का मेन्यू तय करें कि किस दिन कब क्या बनेगा.....? इसमें एक-आध दिन नूडल्स जैसी चीजें शामिल कर सकते हैं। अगर बच्चा रूल बनाने में शामिल रहेगा तो वह उन्हें फॉलो भी करेगा। यह काम तीन-चार साल के बच्चे के साथ भी बखूबी कर सकते हैं।

कभी-कभी बच्चे की पसंद की चीजें बना दें लेकिन हमेशा ऐसा न करें। पसंद की चीजों में भी ध्यान रहे कि पौष्टिक खाना जरूर हो।  इस डर से कि खा नहीं रहा है, तो कुछ तो खा ले, नूडल्स, सैंडविच, पिज्जा जैसी चीजें बार-बार न बनाएं। वरना वह जान-बूझकर भूखा रहने लगेगा और सोचेगा कि आखिर में उसे पसंद की चीज मिल जाएगी। भूख लगेगी तो बच्चा नॉर्मल खाना खा लेगा।  छोटे बच्चों को खाने में क्रिएटिविटी अच्छी लगती है इसलिए उनके लिए जैम, सॉस आदि से डिजाइन बना दें। सलाद भी अगर फूल, चिड़िया, फिश आदि की शेप में काटकर देंगे तो वह खुश होकर उसे भी खा लेगा।

बच्चे टीचर्स की बातें मानते हैं। टीचर से बात करके टिफिन में ज्यादा और पौष्टिक खाना पैक कर सकते हैं, ताकि वह स्कूल में खा ले।  बच्चे को हर वक्त जंक फूड खाने से न रोकें। उसके साथ बैठकर तय करें कि वह हफ्ते में एक दिन जंक फूड खा सकता है। इसके अलावा, दोस्तों के साथ पार्टी आदि के मौके पर इसकी छूट होगी।

नहीं खाना है', कहने के बजाय उसे समझाएं कि ज्यादा जंक फूड खाने के क्या नुकसान हो सकते हैं। लॉजिक देकर समझाने से वह खाने की जिद नहीं करेगा।  पैरंट्स खुद भी जंक फूड न खाएं। इसके अलावा, जिस चीज के बारे में एक बार कह दिया कि इसे खाना गलत है, बाद में किसी बात से खुश होकर बच्चे को उसे खाने की छूट न दें।

आप ध्यान दें जरा कि दुनिया में कोई भी पैरंट्स परफेक्ट नहीं होते। कभी यह न सोचें कि हम परफेक्टली बच्चों को हैंडल करेंगे तो वे गलती नहीं करेंगे। बच्चे ही नहीं, बड़े लोग भी गलती करते हैं। अगर बच्चे को कुछ सिखा नहीं पा रहे हैं या कुछ दे नहीं पा रहे हैं तो यह न सोचें कि एक टीचर या प्रवाइडर के रूप में हम फेल हो गए हैं। बच्चों के फ्रेंड्स बनने की कोशिश न करें क्योंकि वे उनके पास काफी होते हैं। उन्हें आपकी जरूरत पैरंट्स के तौर पर है।

क्युकि ये बच्चा आपका है और नेतिक जिम्मेदारी भी आपकी है -

उपचार और प्रयोग -